मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग की तैयारी: बंगाल चुनाव से पहले सियासत गरम, विपक्ष बनाम चुनाव आयोग आमने-सामने
Mediawali news, bangal
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही देश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की अगुवाई में विपक्षी दलों ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त Gyanesh Kumar के खिलाफ महाभियोग लाने की तैयारी शुरू कर दी है। आजादी के बाद यह पहली बार है जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए ऐसी मांग उठी है। कोलकाता में बढ़ते इस राजनीतिक विवाद को लेकर सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच तीखी बयानबाजी भी देखने को मिल रही है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।
विपक्ष ने क्यों उठाई महाभियोग की मांग
जानकारी के मुताबिक, विपक्षी दलों ने 13 मार्च को संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने का नोटिस दिया। टीएमसी द्वारा तैयार किए गए करीब 10 पन्नों के दस्तावेज में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए सात प्रमुख कारण बताए गए हैं। इस नोटिस पर लोकसभा के लगभग 120 और राज्यसभा के 73 सांसदों के हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने पद का इस्तेमाल करते हुए पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया और चुनावी प्रक्रिया में निष्पक्षता बनाए रखने में असफल रहे। सबसे बड़ा आरोप वोटर लिस्ट की विशेष जांच प्रक्रिया, जिसे इंटेंसिव स्पेशल रिवीजन (SIR) कहा जाता है, को लेकर लगाया गया है। विपक्ष का कहना है कि इस प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की जा रही है।
98 लाख वोटरों का मुद्दा बना सियासी हथियार
ममता बनर्जी पिछले कुछ महीनों से इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रही हैं। उनका दावा है कि करीब 98 लाख लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाने की योजना बनाई जा रही है। उनके अनुसार इससे आम मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इसी मुद्दे को लेकर जब मुख्य चुनाव आयुक्त कोलकाता पहुंचे तो टीएमसी कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया और “गो बैक” जैसे नारे लगाए। ममता बनर्जी ने भी इस मुद्दे पर धरना देकर चुनाव आयोग के खिलाफ कड़ा संदेश देने की कोशिश की।
बीजेपी का पलटवार
दूसरी तरफ भाजपा ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। पार्टी का कहना है कि वोटर लिस्ट की जांच केवल फर्जी नामों को हटाने के लिए की जा रही है। भाजपा का दावा है कि पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में अवैध घुसपैठिए और फर्जी मतदाता मौजूद हैं, जिन्हें हटाना निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरी है।
CEC को हटाना क्यों है मुश्किल
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को वही सुरक्षा दी गई है जो सुप्रीम कोर्ट के जज को प्राप्त होती है। इसका मतलब है कि उन्हें हटाने के लिए महाभियोग जैसी जटिल प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। इस प्रक्रिया की शुरुआत संसद में नोटिस देने से होती है। लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। इसके बाद स्पीकर या सभापति तय करते हैं कि नोटिस स्वीकार किया जाए या नहीं। यदि नोटिस स्वीकार कर लिया जाता है तो तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई जाती है। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश, किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक वरिष्ठ कानून विशेषज्ञ शामिल होते हैं। अगर समिति आरोपों को सही पाती है, तभी संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से मतदान कराया जाता है। दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर ही मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाया जा सकता है।
राजनीतिक संदेश क्या है
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है। विशेषज्ञों के अनुसार ममता बनर्जी इस मुद्दे को उठाकर यह दिखाना चाहती हैं कि वह मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए केंद्र और चुनाव आयोग से भी टकराने को तैयार हैं। फिलहाल यह साफ है कि महाभियोग की प्रक्रिया लंबी और जटिल होती है, इसलिए पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले कोई बड़ा फैसला आना मुश्किल माना जा रहा है। लेकिन इस मुद्दे ने चुनावी माहौल को जरूर गरमा दिया है और आने वाले दिनों में यह देश की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है।