बजट सत्र में सस्ती स्वास्थ्य सेवा पर बहस के बीच खान सर का ‘लो-कॉस्ट’ अस्पताल बना चर्चा का केंद्र
Delhi News
देश में स्वास्थ्य बजट, आयुष्मान भारत और सरकारी अस्पतालों की स्थिति को लेकर संसद के बजट सत्र में जहां बहस जारी है, वहीं पटना से एक अलग मॉडल चर्चा में आ गया है। लोकप्रिय शिक्षाविद खान सर (फैसल खान) ने बिहार की राजधानी में कम लागत वाला निजी अस्पताल शुरू किया है, जो अपनी बेहद कम दरों के कारण सुर्खियों में है।
इस अस्पताल में ईसीजी मात्र ₹25, एक्स-रे ₹35 और पूरे शरीर की जांच ₹1,000 में की जा रही है। आमतौर पर निजी अस्पतालों में ईसीजी के लिए 200 से 500 रुपये, एक्स-रे के लिए 300 से 800 रुपये और फुल बॉडी चेकअप के लिए 3,000 से 10,000 रुपये तक वसूले जाते हैं। ऐसे में खान सर का मॉडल पारंपरिक निजी अस्पतालों की कीमत संरचना को चुनौती देता नजर आ रहा है।
खान सर का दावा है कि अस्पताल में एआई-संचालित डायग्नोस्टिक मशीनों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे अनावश्यक जांच कम हों और लागत घटे। उनका कहना है कि उद्देश्य मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि दैनिक वेतन भोगी मजदूरों, रिक्शा चालकों, छोटे दुकानदारों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को सस्ती और सम्मानजनक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना है। अस्पताल में कीमतों की निगरानी की व्यवस्था भी की गई है ताकि शुल्क कम ही बने रहें।
बजट सत्र के दौरान जब स्वास्थ्य बजट में वृद्धि, इंफ्रास्ट्रक्चर और मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाने जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है, तब खान सर का यह कदम एक “जमीनी मॉडल” के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि यह पहल किसी सरकारी योजना का हिस्सा नहीं है और न ही बजट सत्र से आधिकारिक रूप से जुड़ी है, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे स्वास्थ्य क्षेत्र में “सिस्टम के बाहर का प्रयोग” बताया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में निजी अस्पतालों की ऊंची लागत अक्सर मरीजों को कर्ज या संपत्ति बेचने की स्थिति में पहुंचा देती है। ऐसे में यदि कम लागत पर गुणवत्ता बनी रहती है, तो यह मॉडल स्वास्थ्य क्षेत्र में नई बहस छेड़ सकता है। हालांकि कुछ लोग यह भी सवाल उठा रहे हैं कि इतनी कम दरों पर लंबे समय तक संचालन और गुणवत्ता नियंत्रण कैसे सुनिश्चित होगा।
एक शिक्षक के रूप में लाखों छात्रों के बीच लोकप्रिय खान सर अब स्वास्थ्य क्षेत्र में भी प्रयोग कर रहे हैं। बजट सत्र में भले ही उनका नाम आधिकारिक एजेंडे में न हो, लेकिन सस्ती स्वास्थ्य सेवा की बहस में उनका अस्पताल एक “रियलिटी चेक” जरूर बन गया है—कि क्या इलाज सच में इतना महंगा होना जरूरी है, या सिस्टम में कहीं सुधार की गुंजाइश अब भी बाकी है?