10 मिनट डिलीवरी पर ब्रेक: सरकारी फैसले से गिग वर्कर्स को राहत, बोले– काम जरूरी है लेकिन जान से ज्यादा नहीं

नोएडा में डिलीवरी पार्टनर्स ने जताई संतुष्टि, कहा– अब इंसानियत की उम्मीद जगी

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नोएडा। केंद्र सरकार द्वारा 10 मिनट में डिलीवरी जैसे अल्ट्रा-फास्ट दावों पर रोक लगाने के निर्देश के बाद शहर के गिग वर्कर्स ने राहत की सांस ली है। सरकार के इस फैसले को डिलीवरी से जुड़े हजारों वर्कर्स ने सकारात्मक कदम बताया है। उनका कहना है कि रोज़ी-रोटी जरूरी है, लेकिन काम के दबाव में जान जोखिम में डालना किसी भी हालत में सही नहीं है।

टाइम लिमिट का दबाव बनता था हादसों की वजह

सेक्टर-62 में डिलीवरी का काम करने वाले राहुल कुमार बताते हैं कि ऐप पर 10 मिनट की टाइम लिमिट दिखने से ग्राहक लगातार कॉल करने लगते थे। ट्रैफिक जाम, बारिश या खराब मौसम के बावजूद समय पर पहुंचने का दबाव रहता था। मजबूरी में तेज बाइक चलानी पड़ती थी, जिससे सड़क हादसों का खतरा कई गुना बढ़ जाता था। राहुल कहते हैं कि कई बार डर लगता था कि कहीं किसी दिन बड़ा हादसा न हो जाए।

रेटिंग और ऑर्डर कम होने का डर

सेक्टर-18 इलाके में काम कर रहे अरुण कुमार ने बताया कि देर होने की स्थिति में रेटिंग खराब होने का डर हमेशा बना रहता था। कई बार रेड लाइट तोड़ने या गलत साइड से जाने जैसी खतरनाक स्थितियां भी बनती थीं। सोच यही रहती थी कि अगर समय से नहीं पहुंचे तो अगला ऑर्डर नहीं मिलेगा। सरकार के फैसले से अब उम्मीद है कि कंपनियां भी वर्कर्स की मजबूरी समझेंगी।

मानसिक तनाव और असुरक्षा भी थी बड़ी समस्या

डिलीवरी पार्टनर संदीप का कहना है कि रात के समय 10 मिनट में डिलीवरी करने का टारगेट मानसिक तनाव बढ़ा देता था। असुरक्षा का डर अलग रहता था। जल्दी पहुंचने की चिंता में ध्यान भटक जाता था, जिससे दुर्घटनाओं की आशंका और बढ़ जाती थी। अब इस दबाव में कमी आने से थोड़ा सुकून महसूस हो रहा है।

ग्राहक से बहस तक की नौबत

गिग वर्कर्स ने बताया कि कई बार अगर 10 मिनट की जगह 15 या 20 मिनट लग जाए तो ग्राहक बहस करने लगते थे। कुछ मामलों में तो पैसे देने से भी इनकार कर दिया जाता था। ट्रैफिक या जाम जैसी परिस्थितियों को समझने के बजाय सारा गुस्सा डिलीवरी पार्टनर पर निकाला जाता था, जिससे उन्हें मानसिक और आर्थिक दोनों तरह की परेशानी झेलनी पड़ती थी।

सरकार के फैसले का स्वागत

गिग वर्कर्स का कहना है कि यह फैसला सिर्फ सड़क सुरक्षा ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहद जरूरी था। लगातार समय सीमा में बंधे रहने से तनाव, थकान और चिड़चिड़ापन बढ़ रहा था।

संजिव कुमार कहते हैं, “सरकार हमारे साथ है, यही बात सबसे खास है।”
संदीप सिंह का कहना है, “कोई भी काम जान से बढ़कर नहीं है, लेकिन मजबूरी में करते थे, अब काफी राहत है।”
राजेश तंवर बताते हैं, “रात में सबसे ज्यादा परेशानी होती थी, खासकर जब कुछ लोग नशे में रहते थे।”
वहीं शशिभूषण कहते हैं, “हमारे करीब 10 दोस्तों का ग्रुप यह काम करता है, सभी इस फैसले से काफी खुश हैं।”

गिग वर्कर्स को उम्मीद है कि अब डिलीवरी कंपनियां भी इंसानी हालात समझेंगी और सुरक्षित काम का माहौल बनाएंगी।

 
 

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