केरल में SIR को लेकर विरोध: अधिकारी की मौत के बाद 17 नवंबर को बीएलओ करेंगे काम का बहिष्कार
केरल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है। कन्नूर जिले में एक बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद राज्यभर के कर्मचारी संगठनों ने 17 नवंबर को काम ठप करने की घोषणा की है। इससे सोमवार को एसआईआर का पूरा काम प्रभावित होने की आशंका है।
कई कर्मचारी संगठन आंदोलन में शामिल
रविवार को राज्य सरकारी कर्मचारी एवं शिक्षक कार्रवाई परिषद, शिक्षक सेवा संगठनों की संयुक्त समिति और केरल एनजीओ संघ सहित कई संगठनों ने साफ कहा कि 17 नवंबर को कोई भी बीएलओ काम पर नहीं जाएगा। इसके साथ ही मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के दफ्तर और सभी जिलों के कलेक्टरेट में संयुक्त विरोध मार्च निकाला जाएगा।
संगठनों का आरोप है कि एसआईआर प्रक्रिया और आगामी स्थानीय निकाय चुनावों की तैयारियों ने बीएलओ पर अत्यधिक कार्यभार थोप दिया है। उनके मुताबिक, सभी राजनीतिक दलों और कर्मचारी संगठनों ने एसआईआर को टालने की मांग की थी, लेकिन चुनाव आयोग ने इसे अनसुना कर दिया और कम समय में अव्यावहारिक लक्ष्य सौंप दिए, जिससे कर्मचारियों पर भारी मानसिक दबाव बना।
अधिकारी की मौत से भड़का आक्रोश
कन्नूर जिले के पय्यानूर में 44 वर्षीय बीएलओ अनीश जॉर्ज रविवार को अपने घर में फांसी पर लटके पाए गए। परिवार और स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि एसआईआर से जुड़े भारी कार्यभार और तनाव के कारण उन्होंने यह कदम उठाया। उनकी मौत ने राज्य में कर्मचारियों की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता वीडी सतीशन ने घटना की व्यापक जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि बीएलओ पर “अमानवीय स्तर का दबाव” डाला जा रहा है और चुनाव आयोग तथा राज्य सरकार को इस मामले में पारदर्शी जानकारी जारी करनी चाहिए।
बीएलओ पर बढ़ा काम का बोझ
केरल एनजीओ संघ का कहना है कि 23 साल पुरानी मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए बीएलओ से लगातार दिन-रात काम कराया जा रहा है, जबकि कार्य पूरा करने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया है। संघ ने चेतावनी दी कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो आंदोलन और उग्र किया जाएगा।
SIR प्रक्रिया पर उठे सवाल
विपक्ष के अनुसार, एसआईआर प्रक्रिया केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई थी, लेकिन वर्तमान समीक्षा प्रक्रिया विधानसभा चुनावों से भी ज्यादा बोझिल और तनावपूर्ण साबित हो रही है। कर्मचारी संगठनों का दावा है कि यह व्यवस्था कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षा दोनों के लिए खतरा बनती जा रही है।