बिना पेनिट्रेशन रेप नहीं, सिर्फ कोशिश’—छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने बदला फैसला, आरोपी की सजा घटाकर साढ़े तीन साल की
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कहां फंसा मामला?
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के सामने यह मामला एक अहम कानूनी सवाल पर टिका था—क्या घटना के दौरान पेनिट्रेशन हुआ था या नहीं? अदालत ने पीड़िता की गवाही और मेडिकल रिपोर्ट दोनों की गहन जांच की।
अपने शुरुआती बयान में पीड़िता ने पेनिट्रेशन होने का आरोप लगाया था, लेकिन बाद में उसने स्वीकार किया कि आरोपी ने वास्तविक पेनिट्रेशन नहीं किया, बल्कि अपने प्राइवेट पार्ट्स को उसके प्राइवेट पार्ट्स पर रखा था।
मेडिकल रिपोर्ट में भी यह पुष्टि हुई कि पीड़िता की हाइमन पूरी तरह सही सलामत थी। हालांकि, वल्वा पर लालिमा और कपड़ों पर ह्यूमन स्पर्म की मौजूदगी पाई गई थी, जिससे यौन हमला और आरोपी की मंशा स्पष्ट होती है।
कोर्ट ने क्यों बदला फैसला?
हाई कोर्ट ने कहा कि यौन हमला और आपराधिक इरादे के स्पष्ट सबूत मौजूद थे, लेकिन 2013 से पहले लागू IPC कानून के तहत रेप साबित करने के लिए पेनिट्रेशन का प्रमाण जरूरी था।
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने कहा कि जेनिटल को रगड़ना और हल्का संपर्क—even स्पर्म की मौजूदगी के साथ—रेप की कोशिश तो दर्शाता है, लेकिन यह उस समय की सख्त कानूनी परिभाषा के अनुसार रेप साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं था।
इसी आधार पर कोर्ट ने आरोपी की सजा को IPC की धारा 376(1) से बदलकर धारा 376/511 (दुष्कर्म की कोशिश) कर दिया और सजा सात साल से घटाकर साढ़े तीन साल कर दी।
सुप्रीम कोर्ट के उदाहरणों का हवाला
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने निर्णयों का हवाला दिया, जिनमें तैयारी और कोशिश के बीच के कानूनी अंतर को स्पष्ट किया गया है।
कोर्ट ने कहा कि पीड़िता को जबरदस्ती कमरे में ले जाना, उसके कपड़े उतारना और उसे बांधना जैसे कृत्य तैयारी से आगे बढ़कर स्पष्ट रूप से दुष्कर्म की कोशिश को दर्शाते हैं।
हालांकि, पेनिट्रेशन के ठोस सबूत के बिना धारा 376 लागू नहीं की जा सकती थी। इसलिए अदालत ने सजा को दुष्कर्म की कोशिश के तहत वर्गीकृत किया।
2013 से पहले के कानून का प्रभाव
यह मामला 2004 का है, जब IPC की धारा 375 के तहत रेप साबित करने के लिए पेनिट्रेशन अनिवार्य था।
2013 में निर्भया कांड के बाद कानून में बड़ा बदलाव हुआ, जिसमें पेनिट्रेशन की परिभाषा को व्यापक किया गया और कई अन्य यौन अपराधों को भी रेप की श्रेणी में शामिल किया गया।
लेकिन इस केस में घटना पुराने कानून के तहत हुई थी, इसलिए कोर्ट को उसी समय के प्रावधानों के अनुसार फैसला देना पड़ा।
क्या कहता है यह फैसला?
यह फैसला एक बार फिर भारतीय कानून की जटिलताओं और समय के साथ बदलती कानूनी परिभाषाओं को उजागर करता है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय यह दिखाता है कि अपराध की प्रकृति के बावजूद, अदालतें केवल कानून में मौजूद परिभाषाओं और सबूतों के आधार पर ही सजा तय करती हैं।