नोएडा: महा कौथिक मेले में दिखी आत्मनिर्भर उत्तराखंड की झलक, महिलाओं के हुनर ने बटोरी सुर्खियां
नोएडा स्टेडियम में हर साल लगने वाला महा कौथिक मेला रविवार को वीकेंड के चलते लोगों से खचाखच भरा नजर आया। सुबह से ही परिवारों, युवाओं और बच्चों की भारी भीड़ मेले में उमड़ पड़ी। रंग-बिरंगे स्टॉल, पारंपरिक वेशभूषा और लोकसंगीत ने उत्तराखंड की समृद्ध पहाड़ी संस्कृति की जीवंत तस्वीर पेश की। इस मेले में खास आकर्षण रहीं उत्तराखंड की महिलाएं, जो अपने हुनर और उद्यमिता के जरिए आत्मनिर्भर भारत की मजबूत मिसाल पेश करती नजर आईं।
मेले में हस्तशिल्प, पारंपरिक ज्वेलरी, घरेलू उत्पाद और पहाड़ी व्यंजनों के स्टॉल पर जमकर खरीदारी हुई। मंडुआ रोटी, झंगोरे की खीर और अन्य पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद लेने के लिए लोगों को लंबी कतारों में खड़ा देखा गया।
पारंपरिक ज्वेलरी से बनाई अलग पहचान
टिहरी गढ़वाल की रहने वाली लक्ष्मी जयदेव पवार पिछले तीन साल से अलग-अलग सरकारी कार्यक्रमों और मेलों में अपने हुनर की पहचान बना रही हैं। ‘ओजी ज्वेलरी’ नाम से लगाए गए उनके स्टॉल पर पारंपरिक हैंडमेड ज्वेलरी की खूब मांग रही। लक्ष्मी बताती हैं कि उनकी टीम में छह लोग काम करते हैं, जिनमें चार महिलाएं और दो पुरुष शामिल हैं।
चोकर डिजाइन, अंगूठी और कड़े जैसी पारंपरिक ज्वेलरी लोगों को खासा आकर्षित कर रही है। लक्ष्मी का कहना है कि जब ग्राहक इन डिजाइनों के पीछे की सांस्कृतिक कहानी सुनते हैं, तो वे इन्हें सिर्फ गहना नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पहचान मानकर खरीदते हैं।
पहाड़ की खुशबू लिए अगरबत्ती और कैंडल
पौड़ी गढ़वाल की निवासी कुसुम रावत पिछले पांच साल से पहाड़ी अगरबत्ती और कैंडल बनाकर अपना व्यवसाय चला रही हैं। उनके उत्पादों में प्राकृतिक खुशबू और शुद्ध सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी वजह से शहरों में इनकी मांग तेजी से बढ़ रही है।
महा कौथिक मेले में उनके स्टॉल पर महिलाओं और बुजुर्गों की खास भीड़ देखने को मिली। कुसुम का कहना है कि लोग अब केमिकल-फ्री और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
बच्चों को भाए खाने वाले खिलौने
मेले में बच्चों का सबसे बड़ा आकर्षण दिव्या का स्टॉल रहा। कम उम्र में ही दिव्या ने अपनी टीम के साथ हैंडमेड खिलौनों का अनोखा कॉन्सेप्ट तैयार किया है। इन खिलौनों की डिजाइन खाने की चीजों पर आधारित है—जैसे चिप्स, इडली-सांबर, अमूल बटर, दूध पैकेट, आइसक्रीम और फलों की टोकरी।
दिव्या बताती हैं कि उन्होंने देखा कि ऐसे खिलौने विदेशों से आयात होकर महंगे दामों पर बिकते हैं। इसी से प्रेरित होकर उन्होंने सस्ते और सुरक्षित देसी खिलौने बनाने का फैसला किया, ताकि हर बच्चा इन्हें खरीद सके और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की सोच को बढ़ावा मिले।
महा कौथिक मेला न सिर्फ उत्तराखंड की संस्कृति को मंच देता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे पहाड़ की महिलाएं अपने हुनर के दम पर आगे बढ़कर देश की आत्मनिर्भरता में अहम भूमिका निभा रही हैं।