लिव-इन पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: शादीशुदा पुरुष के लिए अपराध नहीं

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Mediawali news

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा है कि यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी बालिग महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहता है, तो इसे कानूनन अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने साफ किया कि कानून और नैतिकता दो अलग-अलग विषय हैं, और न्यायालय केवल संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर निर्णय देता है। इस फैसले के बाद समाज में बहस छिड़ गई है। कई लोग इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहे हैं, तो वहीं कुछ इसे पारिवारिक मूल्यों के खिलाफ मान रहे हैं। खासकर विवाहित महिलाओं के बीच यह चिंता बढ़ी है कि ऐसे मामलों में वैवाहिक रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा।

एडल्टरी कानून का प्रभाव

इस फैसले को समझने के लिए Joseph Shine vs Union of India का जिक्र जरूरी है। साल 2018 में Supreme Court of India ने आईपीसी की धारा 497 (व्यभिचार) को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।

  • इससे पहले व्यभिचार एक आपराधिक अपराध था

  • अब यह केवल वैवाहिक विवाद का विषय रह गया है

  • ऐसे मामलों में फौजदारी केस नहीं, बल्कि तलाक का विकल्प मौजूद है

तलाक का आधार बन सकता है संबंध

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, भले ही लिव-इन रिलेशनशिप अपराध नहीं है, लेकिन यह विवाह टूटने का आधार बन सकता है। यदि पति या पत्नी विवाह के बाहर संबंध बनाते हैं, तो दूसरा पक्ष इस आधार पर तलाक की मांग कर सकता है।

लिव-इन रिलेशनशिप को मिली कानूनी मान्यता

Supreme Court of India पहले ही लिव-इन रिलेशनशिप को कुछ शर्तों के साथ मान्यता दे चुका है।

  • दोनों बालिग हों

  • संबंध स्वेच्छा से हो

  • लंबे समय तक साथ रहकर खुद को पति-पत्नी की तरह प्रस्तुत करें

इन शर्तों को पूरा करने पर महिला को गुजारा भत्ता (maintenance) का अधिकार भी मिल सकता है।

महिलाओं के अधिकार और सवाल

कानून में बदलाव के बाद महिलाओं के अधिकारों को लेकर भी सवाल उठे हैं। पहले जहां पति को शिकायत का अधिकार था, अब वह प्रावधान खत्म हो चुका है। इससे यह बहस भी सामने आई है कि क्या यह निर्णय महिलाओं की सुरक्षा को प्रभावित करता है या उन्हें अधिक स्वतंत्रता देता है।

समाज की बदलती सोच

विशेषज्ञ मानते हैं कि शहरी क्षेत्रों में लिव-इन रिलेशनशिप अब पहले से ज्यादा सामान्य हो रहा है। हालांकि सामाजिक नैतिकता अभी भी इसे पूरी तरह स्वीकार नहीं करती, लेकिन कानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा को प्राथमिकता देता है। यह फैसला साफ करता है कि व्यक्तिगत संबंधों को कानून के दायरे में केवल तब ही अपराध माना जाएगा जब वे किसी कानूनी प्रावधान का उल्लंघन करें। लिव-इन रिलेशनशिप भले ही समाज में विवाद का विषय हो, लेकिन भारतीय कानून इसे अपराध नहीं मानता।

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