राम मंदिर में धर्म ध्वजा फहराने का ऐतिहासिक क्षण

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योगी आदित्यनाथ के संबोधन से भावुक हुए संत—गूंज उठा पूरा परिसर ‘जय श्री राम’ के नारों से

अयोध्या में राम मंदिर के शिखर पर धर्म ध्वजा फहराने का समारोह इतिहास के अमर पलों में दर्ज हो गया। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भावुक कर देने वाले संबोधन ने वहां मौजूद साधु-संतों, रामभक्तों और उपस्थित लोगों को गहराई तक प्रभावित किया।
मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में उन असंख्य संतों, रामभक्तों और कर्मवीरों को याद किया जिन्होंने राम मंदिर निर्माण और रामलला की पुनर्स्थापना के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। उनके शब्दों ने वातावरण को श्रद्धा और भावुकता से भर दिया।

प्रधानमंत्री द्वारा ध्वजारोहण और ‘जय श्री राम’ की गूंज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मंदिर के शिखर पर धर्म ध्वजा फहराए जाने के क्षण ने पूरे रामजन्मभूमि परिसर को भक्तिमय कर दिया।
चारों ओर ‘जय श्री राम’ के गगनभेदी नारे गूंज उठे, मानो सदियों के इंतजार को आवाज मिल गई हो।

संतों की आंखें हुईं नम—भावनाओं का ज्वार उमड़ा

जैसे ही योगी आदित्यनाथ बलिदान देने वाले आंदोलनकारियों और संतों के स्मरण पर पहुंचे, मंच पर बैठे कई संतों की आंखें नम हो गईं।
महंत नृत्यगोपालदास, दशरथ महल पीठाधीश्वर बिंदुगाद्याचार्य देवेंद्रप्रसादाचार्य महाराज, जगद्गुरु अर्जुनद्वाराचार्य और कृपालु रामभूषणदेवाचार्य सहित अनेक संत भावुक होकर आंसू पोंछते दिखे।

मंच के पास बैठे एक बुजुर्ग संत तो सिसकते हुए बोले—
“आज हमारा सपना साकार हुआ। जिन साथियों ने जान दी, जेल गए… आज वे जहां होंगे, प्रसन्न होंगे।”

इस भावनात्मक माहौल ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह क्षण केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अनगिनत त्यागों और संघर्षों का फल है।

500 वर्षों के इंतजार का अंत

कृपालु रामभूषणदेवाचार्य ने कहा कि सनातनियों ने इस पवित्र क्षण का 500 वर्षों तक इंतजार किया।
धर्मध्वजा फहरते ही उन्हें लगा कि हर रामभक्त का जीवनभर का सपना पूरा हो गया।
यह पल राम मंदिर आंदोलन की कठिन लेकिन गौरवशाली यात्रा की जीवंत याद दिलाता है—
एक ऐसा आंदोलन जिसने इतिहास, आस्था और त्याग को एक सूत्र में पिरोया।

समारोह ने दिया एकता और श्रद्धा का संदेश

कार्यक्रम की हर झलक में भक्ति, समर्पण और कृतज्ञता दिखाई दी।
सैकड़ों संतों की उपस्थिति और उनका भावुक होना इस बात का प्रमाण था कि यह अवसर केवल निर्माण का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण और राष्ट्रीय एकता का उत्सव था।

राम नगरी अयोध्या की धरा उस दिन सचमुच पावन हो उठी—
जहां धर्म, भावना और इतिहास एक साथ खड़े दिखे।

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