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पीड़ादायक जीवन या सम्मानजनक मृत्यु? हरीश राणा की इच्छा पर अदालत का फैसला सुरक्षित

दिल्ली के रहने वाले हरीश राणा की जिंदगी पिछले 12 वर्षों से एक ही जगह ठहर गई है। साल 2013 में पीजी आवास की बालकनी से गिरने के बाद उन्हें सिर में गंभीर चोटें आई थीं। इस हादसे के बाद से हरीश कोमा जैसी वेजिटेटिव अवस्था में हैं। न वे बोल सकते हैं, न चल सकते हैं और न ही अपने आसपास की किसी गतिविधि को समझ पाते हैं।

मेडिकल उपकरणों पर टिकी सांसें

हरीश की पूरी जिंदगी अब मेडिकल उपकरणों, नियमित देखभाल और दूसरों की मदद पर निर्भर हो चुकी है। डॉक्टरों के अनुसार, वह केवल शारीरिक रूप से जीवित हैं, लेकिन उनके सामान्य जीवन में लौटने की कोई संभावना नहीं है। बीते 12 सालों में उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है।

परिवार ने मांगी पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति

हरीश के परिवार ने अदालत में पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति की मांग की है। परिवार का कहना है कि इस तरह का जीवन न तो मानवीय है और न ही सम्मानजनक। हर दिन अपने बेटे को इस हालत में देखना उनके लिए मानसिक और भावनात्मक रूप से बेहद पीड़ादायक है।

भावनात्मक और आर्थिक बोझ

परिवार ने अदालत को बताया कि लंबे समय से चल रहे इलाज और देखभाल ने उन पर भारी आर्थिक बोझ डाल दिया है। इसके साथ ही, लगातार पीड़ा देखना परिवार के लिए असहनीय होता जा रहा है। उनका तर्क है कि हरीश को गरिमा के साथ जीवन से विदा होने का अधिकार मिलना चाहिए।

अदालत के सामने संवेदनशील सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने डॉक्टरों की मेडिकल रिपोर्ट, विशेषज्ञों की राय और परिवार की दलीलों को गंभीरता से सुना। अदालत ने कहा कि यूथेनेशिया जैसे मामलों में बेहद सावधानी जरूरी है, ताकि किसी तरह का दुरुपयोग न हो।

फैसला सुरक्षित, देश की निगाहें टिकीं

अदालत ने इस संवेदनशील मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह मामला सिर्फ हरीश राणा तक सीमित नहीं है, बल्कि उन हजारों मरीजों से जुड़ा है जो लंबे समय से असहनीय पीड़ा में जी रहे हैं। अब सवाल यही है—जब जीवन केवल सांसों तक सिमट जाए, तो क्या सम्मानजनक मृत्यु भी एक अधिकार हो सकती है?

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