नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता के गर्भपात मामले पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
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सुप्रीम कोर्ट ने 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के 30 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान संवेदनशील टिप्पणी करते हुए कहा कि एक बच्ची को इस उम्र में मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जिस उम्र में उसे पढ़ाई और सामान्य जीवन जीना चाहिए, उस समय वह गंभीर मानसिक और शारीरिक पीड़ा से गुजर रही है। यह मामला तब सामने आया जब एम्स (AIIMS) ने सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव याचिका दाखिल कर अपने ही उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की, जिसमें पीड़िता को गर्भपात की अनुमति दी गई थी।
कोर्ट ने पीड़िता के दर्द को बताया गंभीर
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह केवल कानूनी मामला नहीं, बल्कि एक मासूम बच्ची के भविष्य और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा विषय है। अदालत ने कहा कि दुष्कर्म का दर्द और सामाजिक अपमान पीड़िता को जीवनभर प्रभावित कर सकता है। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा, “जरा सोचिए, यह अभी एक बच्ची है। इस समय उसे स्कूल में होना चाहिए, लेकिन हम उसे मां बनाने की बात कर रहे हैं।” कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी लड़की पर उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था नहीं थोपी जा सकती।
AIIMS ने जताई स्वास्थ्य संबंधी चिंता
सुनवाई के दौरान AIIMS की ओर से अदालत को बताया गया कि इतनी देर से गर्भपात कराना नाबालिग के स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। डॉक्टरों ने कहा कि यह केवल “बच्ची बनाम भ्रूण” का मामला नहीं, बल्कि “बच्ची बनाम बच्ची” जैसा संवेदनशील प्रश्न है। एम्स ने अदालत से कहा कि यदि गर्भपात कराया जाता है, तो भविष्य में नाबालिग को कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। अस्पताल ने इस आधार पर फैसले पर पुनर्विचार की मांग की थी।
अंतिम निर्णय पीड़िता और परिवार का होना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अंतिम फैसला पीड़िता और उसके माता-पिता का होना चाहिए। अदालत ने AIIMS को निर्देश दिया कि वह परिवार की उचित काउंसलिंग करे और उन्हें संभावित जोखिमों और परिणामों की पूरी जानकारी दे, ताकि वे सोच-समझकर निर्णय ले सकें। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि डॉक्टर सलाह दे सकते हैं, लेकिन किसी महिला या बच्ची पर जबरन मातृत्व नहीं थोपा जा सकता। अदालत ने पीड़िता की मानसिक स्थिति और सामाजिक दबाव को भी गंभीर मुद्दा बताया।
रेप पीड़िताओं के लिए कानून में बदलाव की जरूरत
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी महत्वपूर्ण सुझाव दिए। अदालत ने कहा कि दुष्कर्म के कारण हुई गर्भावस्था के मामलों में गर्भपात की समय-सीमा को लेकर कानून अधिक लचीला होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि कई बार पीड़िताएं मानसिक आघात, सामाजिक डर या अन्य कारणों से समय पर सामने नहीं आ पातीं। ऐसे में 20 सप्ताह की कानूनी सीमा कई मामलों में पीड़िताओं के लिए बाधा बन जाती है।
एक सप्ताह में सुनवाई पूरी करने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से यह भी कहा कि रेप पीड़िताओं से जुड़े मामलों की सुनवाई तेज गति से होनी चाहिए। अदालत ने सुझाव दिया कि ऐसे मामलों का निपटारा एक सप्ताह के भीतर करने पर विचार किया जाए, ताकि पीड़िताओं को लंबे समय तक कानूनी और मानसिक तनाव का सामना न करना पड़े। कोर्ट ने कहा कि नाबालिग दुष्कर्म पीड़िताओं को बार-बार अदालत और मेडिकल प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, जिससे उनका मानसिक आघात और बढ़ जाता है। इसलिए न्याय व्यवस्था को अधिक संवेदनशील और त्वरित बनाने की आवश्यकता है।