कागज पर 18 प्रतिशत जीएसटी, किताबों पर 5 प्रतिशत: उलझन में नोएडा के उद्यमी

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कागज पर 18 प्रतिशत जीएसटी, किताबों पर 5 प्रतिशत: उलझन में नोएडा के उद्यमी

नोएडा।
शहर के उद्यमी जीएसटी की मौजूदा व्यवस्था को लेकर गंभीर असमंजस और नाराजगी में हैं। उद्यमियों का कहना है कि एक ही उत्पाद श्रृंखला में अलग-अलग जीएसटी दरें लागू होने से लागत और मुनाफे का संतुलन बिगड़ गया है। जहां कागज जैसे कच्चे माल पर 18 प्रतिशत जीएसटी देना पड़ रहा है, वहीं उसी कागज से बनी किताबें 5 प्रतिशत जीएसटी पर बाजार में बिक रही हैं। इससे विनिर्माण इकाइयों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।

बजट से थी राहत की उम्मीद, लेकिन निराशा हाथ लगी

उद्यमियों को इस वर्ष के केंद्रीय बजट से कच्चे माल और सप्लाई चेन से जुड़ी समस्याओं पर राहत मिलने की उम्मीद थी। हालांकि, एक फरवरी को पेश किए गए आम बजट में इस दिशा में कोई ठोस घोषणा नहीं की गई। इससे जिले के लगभग 30 हजार से अधिक विनिर्माण उद्योगों में निराशा है।

नोएडा एंटरप्रेन्योर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष सुधीर श्रीवास्तव ने बताया कि कच्चे माल के दाम लगातार अप्रत्याशित रूप से बढ़ रहे हैं। इसके साथ ही सप्लाई चेन की समस्याएं भी उद्योगों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि पिछले कई वर्षों से उद्योग जगत इन मुद्दों को लेकर बजट पर नजर लगाए बैठा था, लेकिन इस बार भी कोई राहत नहीं मिली।

कच्चे माल पर महंगाई के साथ भारी जीएसटी का बोझ

आईआईए नोएडा चैप्टर के चेयरमैन मनीष गुप्ता ने बताया कि पिछले एक माह में कॉपर की कीमतें 800 रुपये से बढ़कर 1400 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई हैं। इसी तरह अन्य कच्चे माल, जैसे धातु और कागज, भी लगातार महंगे होते जा रहे हैं। बढ़ी हुई कीमतों पर 18 प्रतिशत जीएसटी देना पड़ रहा है, जिससे उत्पादन लागत में भारी इजाफा हो रहा है।

उन्होंने कहा कि इसका सीधा असर ग्राहकों पर पड़ रहा है, जिन्हें महंगे दामों पर उत्पाद खरीदने पड़ रहे हैं। ऐसे में उपभोक्ता सस्ते चीनी उत्पादों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे स्वदेशी उद्योगों को बाजार में टिके रहना मुश्किल हो रहा है।

श्रमिकों के लिए भी नहीं मिली कोई राहत

उद्यमियों का कहना है कि इस बजट में उद्योगों की रीढ़ माने जाने वाले श्रमिकों और उनके परिवारों के लिए भी कोई ठोस राहत नहीं दी गई। सुधीर श्रीवास्तव ने बताया कि नोएडा में श्रमिकों के स्थायी आवास के लिए करीब 20 वर्ष पहले श्रमिक कुंज बनाए गए थे, लेकिन उसके बाद से न तो नए श्रमिक कुंज बनाए गए और न ही बजट में इसके लिए कोई प्रावधान किया गया। मजबूरी में श्रमिकों को किराए के मकानों में रहना पड़ता है, जिससे वे अधिक वेतन की मांग करते हैं और उद्योगों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

उत्पादन को नहीं मिला खास लाभ

उद्यमी नीरज सिंह ने कहा कि इस बजट से कच्चे माल और सप्लाई चेन पर राहत की उम्मीद थी, लेकिन हकीकत में उत्पादन क्षेत्र को कोई खास फायदा नहीं मिला। उनका कहना है कि यदि जीएसटी संरचना और कच्चे माल की कीमतों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले समय में विनिर्माण उद्योगों के लिए स्थिति और कठिन हो सकती है।

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