मिडिल ईस्ट में बढ़ता ईरान–इजरायल–अमेरिका संघर्ष सिर्फ क्षेत्रीय संकट नहीं है, बल्कि इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। अगर यह टकराव जल्द नहीं थमा, तो भारत को व्यापार, रोजगार, विदेशी मुद्रा भंडार और ऊर्जा आपूर्ति के मोर्चे पर बड़े झटके लग सकते हैं।
व्यापार पर गहरा असर
भारत का सबसे बड़ा क्षेत्रीय व्यापारिक साझेदार Gulf Cooperation Council (GCC) है, जिसमें सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन शामिल हैं। FY 2024-25 में भारत और GCC के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 178.56 अरब डॉलर रहा, जो भारत के कुल वैश्विक व्यापार का करीब 15% है।
यदि युद्ध बढ़ता है और इन देशों में अस्थिरता बढ़ती है, तो निर्यात-आयात प्रभावित होगा। इससे भारतीय उद्योगों और व्यापारियों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
बेरोजगारी का खतरा
खाड़ी देशों में 85 लाख से अधिक भारतीय काम कर रहे हैं। यूएई और सऊदी अरब में सबसे ज्यादा भारतीय प्रवासी हैं। यदि संघर्ष के कारण वहां की अर्थव्यवस्था धीमी पड़ती है या कंपनियां बंद होती हैं, तो बड़ी संख्या में भारतीयों की नौकरियां जा सकती हैं।
ऐसी स्थिति में भारत लौटने वाले लोगों से देश में बेरोजगारी का दबाव बढ़ सकता है।
विदेशी मुद्रा भंडार पर असर
GCC देशों से भारत को भारी मात्रा में रेमिटेंस (विदेश से भेजा गया पैसा) मिलता है। RBI के अनुसार, कुल इनवर्ड रेमिटेंस का लगभग 38% हिस्सा इन देशों से आता है।
अगर युद्ध लंबा खिंचता है और लोगों की आय प्रभावित होती है, तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और चालू खाता संतुलन पर दबाव पड़ सकता है।
तेल-गैस संकट और महंगाई
भारत अपनी 85% कच्चे तेल की जरूरत आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से आता है। यदि यह मार्ग बाधित होता है, तो तेल और LNG की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।
ब्रेंट क्रूड पहले ही 80 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है। इससे पेट्रोल-डीजल महंगा होगा, महंगाई बढ़ेगी और उद्योगों की लागत भी बढ़ेगी।
कुल मिलाकर, ईरान संघर्ष का लंबा खिंचना भारत के लिए आर्थिक चुनौती बन सकता है। इसलिए हालात पर करीबी नजर और कूटनीतिक संतुलन बेहद जरूरी है।