साहित्य अकादमी में गूंजी लोकगीतों की मिठास, नारी शक्ति पर हुआ संवाद

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नई दिल्ली। Sahitya Akademi में शनिवार को ‘लोक साहित्य में नारी चित्रण’ विषय पर एक दिवसीय परिसंवाद आयोजित किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों की लोक परंपराओं और साहित्य में महिलाओं की भूमिका पर विस्तृत चर्चा हुई। साथ ही अलग-अलग क्षेत्रों के लोकगीतों की प्रस्तुति ने कार्यक्रम को और भी आकर्षक बना दिया।

लोक साहित्य समाज की भावनात्मक आत्मकथा

कार्यक्रम की शुरुआत अकादेमी की कार्यक्रम अधिकारी मृगनयनी गुप्ता के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने कहा कि लोक साहित्य केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज और समुदाय की भावनात्मक आत्मकथा है। इसमें महिलाओं के कई रूप देखने को मिलते हैं—माता, शक्ति, विद्रोही और प्रेरणा का स्रोत।

शिव-पार्वती समन्वय पर जोर

परिसंवाद की मुख्य वक्ता Mouli Kaushal ने अपने विचार रखते हुए शिव और पार्वती के समन्वय को नारी शक्ति का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि भगवान शिव अपनी सारी शक्तियां पार्वती से ही प्राप्त करते हैं, क्योंकि पार्वती ही साक्षात शक्ति का स्वरूप हैं। उनके विचारों ने नारी के महत्व और उसकी शक्ति को रेखांकित किया।

लोक परंपराओं में स्त्री की सशक्त भूमिका

कार्यक्रम के विभिन्न सत्रों में कुमाऊंनी, छत्तीसगढ़ी, अंडमानी और पूर्वोत्तर भारत की लोक परंपराओं में स्त्री की भूमिका पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी और लोक समाज में महिलाओं को हमेशा से सशक्त और प्रकृति के करीब माना गया है।

लोकगीतों की प्रस्तुति ने बढ़ाया आकर्षण

इस दौरान Vandana Tete ने लोक साहित्य को ‘पुरखा साहित्य’ बताते हुए कहा कि इसमें स्त्री की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है और उसके बिना सृजन संभव नहीं है। कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के लोकगीतों की प्रस्तुति भी दी गई, जिसने उपस्थित लोगों को लोक संस्कृति की मिठास से रूबरू कराया।

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