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लखनऊ मेट्रो के पहले कॉरिडोर में भारी अनियमितताएं, CAG रिपोर्ट में 6,928 करोड़ प्रोजेक्ट पर गंभीर सवाल

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अमौसी से मुंशी पुलिया तक बने लखनऊ मेट्रो के पहले कॉरिडोर में बड़े स्तर पर गड़बड़ियां सामने आई हैं। यह खुलासा भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की ऑडिट रिपोर्ट में हुआ है। यह रिपोर्ट नवंबर 2013 से मार्च 2023 के बीच के कामकाज पर आधारित है। यह प्रोजेक्ट करीब 6,928 करोड़ रुपये का था, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक कई फैसले बिना मंजूरी और बिना तय प्रक्रिया अपनाए लिए गए।

1. योजना और स्टेशन हटाने पर सवाल

रिपोर्ट में कहा गया कि प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले जरूरी “इंटीग्रेटेड मास ट्रांजिट सिस्टम प्लान” नहीं बनाया गया।
डीपीआर में 22 स्टेशन मंजूर थे, लेकिन “महानगर” स्टेशन को बिना केंद्र या राज्य सरकार की अनुमति के हटा दिया गया। जबकि अनुमान के अनुसार यह स्टेशन यात्रियों की संख्या के हिसाब से बड़ा स्टेशन माना गया था।

2. यात्री अनुमान पूरी तरह गलत साबित

डीपीआर में जितने यात्रियों का अनुमान लगाया गया था, उसका 10% भी यात्री इस रूट पर नहीं मिले। इससे प्रोजेक्ट को आर्थिक नुकसान हुआ।

3. ठेके और भुगतान में गड़बड़ी

  • एलएंडटी से 142 करोड़ रुपये की परफॉर्मेंस सिक्योरिटी ली जानी थी, लेकिन सिर्फ 67 करोड़ ही जमा कराए गए।
  • 31 करोड़ रुपये की मशीनों और उपकरणों के लिए एडवांस भुगतान कर दिया गया, जबकि कुछ मशीनें पहले से ठेकेदार के पास थीं।
  • 15 करोड़ के काम पर 50-60 करोड़ रुपये तक खर्च कर दिए गए।
  • ठेकेदारों द्वारा बताए गए रेट पर ही करोड़ों रुपये के काम करा लिए गए, बिना विभाग द्वारा रेट तय किए।

4. विज्ञापन और सुरक्षा अनुबंध में अनियमितता

  • ट्रेनों में विज्ञापन का ठेका देने वाली फर्म ने बीच में काम छोड़ दिया, लेकिन उससे 93 लाख रुपये की वसूली नहीं की गई।
  • सुरक्षा का ठेका तीन साल के लिए था, लेकिन 2023 तक बढ़ा दिया गया और खुली निविदा प्रक्रिया नहीं अपनाई गई।

5. 541 करोड़ के टेंडर पर सवाल

541 करोड़ रुपये के बड़े टेंडर में टेक्निकल बिड में सफल एक कंपनी को फाइनेंशियल बिड में शामिल नहीं किया गया। इस पर भी ऑडिट टीम ने सवाल उठाए और संतोषजनक जवाब नहीं मिला।

क्या है बड़ा मुद्दा…

रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि टेंडर प्रक्रिया, लागत बढ़ोतरी, भुगतान और सुरक्षा मानकों में कई स्तर पर नियमों की अनदेखी हुई। अब यह मामला राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। सरकार की तरफ से कुछ जवाब दिए गए हैं, लेकिन ऑडिट टीम ने कई स्पष्टीकरणों को संतोषजनक नहीं माना।


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