टेक सपोर्ट के नाम पर विदेशी नागरिकों को ठगने वाला कॉल सेंटर पकड़ा, चार गिरफ्तार
डर और तकनीक का इस्तेमाल
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक साइबर अपराधी अब तकनीक के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक दबाव का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। सिस्टम हैक होने का डर दिखाकर लोगों को जल्दी फैसला लेने के लिए मजबूर किया जाता है। टेक सपोर्ट फ्रॉड दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहा है और इसमें विदेशी नागरिकों को खासतौर पर निशाना बनाया जाता है।
Mediawali news, Noida
नोएडा। तकनीकी सहायता देने के नाम पर यूरोप और अमेरिका के नागरिकों को निशाना बनाकर ठगी करने वाले एक फर्जी कॉल सेंटर का साइबर क्राइम पुलिस ने पर्दाफाश किया है। पुलिस ने गिरोह के सरगना समेत चार आरोपियों को सेक्टर-76 से गिरफ्तार किया है। आरोपियों के पास से लैपटॉप, मोबाइल और अन्य डिजिटल उपकरण बरामद हुए हैं। शुरुआती जांच में सामने आया है कि आरोपी अब तक 250 से अधिक विदेशी नागरिकों को अपना शिकार बना चुके हैं और करोड़ों रुपये की ठगी कर चुके हैं।
डीसीपी साइबर शैव्या गोयल ने बताया कि साइबर क्राइम थाने की टीम को लंबे समय से सेक्टर-76 क्षेत्र में संदिग्ध गतिविधियों की सूचना मिल रही थी। तकनीकी सर्विलांस और लोकल इंटेलिजेंस के आधार पर मंगलवार को छापेमारी की गई। इस दौरान मौके से चार आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान 26 वर्षीय मोहम्मद बिलाल, 25 वर्षीय देव कपाही, 27 वर्षीय मुखेजा और 24 वर्षीय कुशाग्र निम्बेकर के रूप में हुई है। इनमें मोहम्मद बिलाल गिरोह का सरगना बताया जा रहा है।
पुलिस के मुताबिक तीन आरोपी दिल्ली के रहने वाले हैं, जबकि एक राजस्थान का निवासी है। सभी आरोपी अलग-अलग राज्यों से आकर नोएडा में मिलकर संगठित तरीके से साइबर ठगी का कॉल सेंटर चला रहे थे। जांच में सामने आया कि आरोपी सोशल मीडिया और इंटरनेट पर टेक सपोर्ट के नाम से पेड विज्ञापन चलाते थे। इन विज्ञापनों में टोल-फ्री नंबर दिए जाते थे। विदेशी नागरिक इन नंबरों पर कॉल करते थे, जिसके बाद आरोपी कॉल रिसीव कर खुद को किसी बड़ी कंपनी का टेक्निकल सपोर्ट एजेंट बताते थे।
आरोपी पीड़ितों को डराने के लिए कहते थे कि उनके कंप्यूटर या मोबाइल को हैक कर लिया गया है और उनका डाटा खतरे में है। इसके बाद वे स्क्रीन शेयरिंग ऐप के जरिए पीड़ित के सिस्टम तक पहुंच बना लेते थे। आरोपी कंप्यूटर स्क्रीन को ब्लैक कर देते थे, जिससे पीड़ित घबरा जाता था और उनकी बातों में आ जाता था।
स्क्रीन एक्सेस मिलने के बाद आरोपी पीड़ित की बैंकिंग जानकारी हासिल कर लेते थे। इसके बाद खाते में मौजूद रकम के हिसाब से ठगी की जाती थी। यदि खाते में कम पैसा होता था तो 350 से 2000 अमेरिकी डॉलर तक वसूले जाते थे। वहीं ज्यादा रकम होने पर कॉल को कथित सीनियर एजेंट को ट्रांसफर कर दिया जाता था, जो बड़े स्तर पर ठगी करता था। ठगी की रकम आरोपी क्रिप्टो करेंसी के जरिए ट्रांसफर कर लेते थे, जिससे पैसों का ट्रैक करना मुश्किल हो जाता था।
बरामदगी से खुला नेटवर्क का राज
पुलिस ने आरोपियों के पास से चार लैपटॉप, आठ मोबाइल फोन, चार माइक्रोफोन हेडफोन और दो राउटर बरामद किए हैं। इन्हीं उपकरणों से कॉल सेंटर संचालित किया जा रहा था। पुलिस को डिजिटल डिवाइस में करोड़ों रुपये के लेनदेन से जुड़े सबूत मिले हैं। अधिकारियों का कहना है कि बरामद उपकरणों की फॉरेंसिक जांच कराई जा रही है, जिससे गिरोह के अन्य सदस्यों तक पहुंचने में मदद मिलेगी।
हवाला से पैसे आने का इनपुट
साइबर थाना प्रभारी ने बताया कि जांच में आरोपियों के खातों में हवाला के जरिए भी रकम आने की जानकारी मिली है। इस एंगल से भी जांच की जा रही है। आरोपी दो महीने पहले ही कॉल सेंटर शुरू किए थे और इसके लिए 40 हजार रुपये महीने पर बिल्डिंग किराए पर ली थी। पुलिस को पूछताछ में कुछ अन्य लोगों के नाम भी मिले हैं, जिनकी तलाश की जा रही है।
डर और तकनीक का इस्तेमाल
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक साइबर अपराधी अब तकनीक के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक दबाव का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। सिस्टम हैक होने का डर दिखाकर लोगों को जल्दी फैसला लेने के लिए मजबूर किया जाता है। टेक सपोर्ट फ्रॉड दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहा है और इसमें विदेशी नागरिकों को खासतौर पर निशाना बनाया जाता है।
पुलिस की अपील
पुलिस ने लोगों से अपील की है कि किसी भी अनजान टेक सपोर्ट कॉल या विज्ञापन पर भरोसा न करें। किसी भी कंपनी का कस्टमर केयर नंबर केवल आधिकारिक वेबसाइट से ही लें। किसी भी अज्ञात व्यक्ति को स्क्रीन शेयरिंग या रिमोट एक्सेस की अनुमति न दें। साइबर ठगी होने पर तुरंत 1930 हेल्पलाइन नंबर पर कॉल करें या नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं।