एहतेशाम सिद्दीकी: “आज़ादी मिली, लेकिन दर्द अब भी है”
मुंबई: साल 2006 के मुंबई लोकल ट्रेन धमाकों के मामले में आरोपी बनाए गए एहतेशाम सिद्दीकी को अदालत से बरी हुए कुछ समय हो चुका है, लेकिन उनका कहना है कि कानूनी आज़ादी मिलने के बाद भी मन का दर्द खत्म नहीं हुआ है। एक बातचीत में एहतेशाम ने कहा, “मुझे मेरी आज़ादी तो मिल गई, लेकिन जो साल मैंने जेल में बिताए, वह दर्द कभी नहीं जाएगा।”
2006 में हुए मुंबई ट्रेन धमाकों ने पूरे देश को हिला दिया था। इस मामले में कई लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें एहतेशाम सिद्दीकी भी शामिल थे। उन पर गंभीर आरोप लगाए गए और उन्हें लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा। एहतेशाम का कहना है कि उन्हें ऐसे अपराध के लिए सजा झेलनी पड़ी, जिसे उन्होंने किया ही नहीं था। उन्होंने बताया कि जेल में बिताया गया हर दिन उनके और उनके परिवार के लिए बेहद मुश्किल भरा था। अदालत द्वारा बरी किए जाने के बाद एहतेशाम को कानूनन राहत जरूर मिली, लेकिन समाज में उन्हें अब भी कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि लोगों की नजर में एक बार लगा दाग आसानी से नहीं मिटता। नौकरी, सम्मान और सामान्य जीवन में लौटना आज भी उनके लिए कठिन है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके परिवार को भी सामाजिक ताने और मानसिक तनाव झेलना पड़ा। एहतेशाम ने न्याय प्रणाली पर भरोसा जताते हुए कहा कि अंत में सच की जीत हुई, लेकिन इस प्रक्रिया में जो समय लगा, उसने उनकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा छीन लिया। उन्होंने सवाल उठाया कि जिन लोगों को गलत तरीके से आरोपी बनाया जाता है, उनके खोए हुए सालों की भरपाई कौन करेगा। उनका मानना है कि जांच प्रक्रिया में और ज्यादा सावधानी और पारदर्शिता होनी चाहिए, ताकि निर्दोष लोगों को ऐसी पीड़ा न सहनी पड़े।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि एहतेशाम का मामला उन कई उदाहरणों में से एक है, जहां लंबे समय तक मुकदमा चलने के बाद निर्दोष लोगों को राहत मिलती है। वे मांग कर रहे हैं कि ऐसे मामलों में पीड़ितों के पुनर्वास और मुआवजे पर भी ध्यान दिया जाए। आज एहतेशाम सिद्दीकी एक सामान्य और सम्मानजनक जीवन जीना चाहते हैं। उनका कहना है कि वह बीते हुए दर्द को पीछे छोड़कर आगे बढ़ना चाहते हैं, लेकिन यह सफर आसान नहीं है। उनकी कहानी न्याय, धैर्य और इंसानी जज्बे की एक गहरी मिसाल बनकर सामने आती है।