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बैल से बनेगी बिजली: यूपी के पूर्व DSP का अनोखा ‘फ्लाईव्हील’ मॉडल, किसानों की आय बढ़ाने का दावा

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ऊर्जा को लेकर आज दुनिया भर में प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है। कई अंतरराष्ट्रीय तनावों के पीछे भी ऊर्जा एक बड़ा कारण माना जाता है। इसी बीच भारत में भी ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार भी सौर ऊर्जा सहित वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर काम कर रही है। इसी कड़ी में एक अनोखा और देसी समाधान सामने आया है, जिसे उत्तर प्रदेश के पूर्व डीएसपी शैलेंद्र सिंह ने विकसित किया है।

शैलेंद्र सिंह ने बैलों की मदद से बिजली पैदा करने की नई तकनीक तैयार की है। इस तकनीक को “फ्लाईव्हील मॉडल” कहा जा रहा है। खास बात यह है कि इसमें पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का मेल देखने को मिलता है। उनके अनुसार, इस मॉडल से न सिर्फ बिजली उत्पादन संभव है, बल्कि किसानों और गौशालाओं के लिए आय का नया स्रोत भी तैयार हो सकता है।

शैलेंद्र सिंह बताते हैं कि वह लखनऊ के सिधपुरा क्षेत्र में साल 2017 से “श्री ग्राम धाम गौशाला” का संचालन कर रहे हैं। इसी दौरान उन्होंने देखा कि बड़ी संख्या में गोवंश, खासकर बैल, सड़कों पर निराश्रित घूमते रहते हैं। इससे ट्रैफिक की समस्या होती है और किसानों की फसल को भी नुकसान पहुंचता है। पहले खेती में बैलों का उपयोग होता था, लेकिन अब उनकी उपयोगिता कम हो गई है। ऐसे में उन्होंने बैलों को फिर से उपयोगी बनाने का विचार किया।

फ्लाईव्हील तकनीक के तहत एक बड़ा पहिया (व्हील) लगाया जाता है, जिसे एक खास कोण पर फिट किया जाता है। इस व्हील से एक मैकेनिकल डायनेमो जुड़ा होता है। बैल को इस व्हील पर इस तरह खड़ा किया जाता है कि उसके सामने चारा रखा होता है। चारा खाने के लिए बैल आगे बढ़ता है, जिससे व्हील घूमता है और डायनेमो के जरिए बिजली पैदा होती है। जब बैल रुकता है तो वह पीछे खिसक जाता है और फिर चारा पाने के लिए आगे बढ़ता है। इस प्रक्रिया से व्हील लगातार चलता रहता है और बिजली बनती रहती है।

उनका दावा है कि एक बैल एक घंटे में करीब 5 यूनिट तक बिजली पैदा कर सकता है। अगर बैल से दिन में 8 घंटे काम लिया जाए, तो लगभग 40 यूनिट बिजली तैयार हो सकती है। यदि सरकार इस बिजली को 7 रुपये प्रति यूनिट की दर से खरीदे, तो किसान को रोजाना लगभग 280 रुपये मिल सकते हैं। इसमें से करीब 100 रुपये बैल के चारे पर खर्च होंगे, जिससे किसान को प्रतिदिन लगभग 180 रुपये का फायदा हो सकता है। इस तरह महीने में करीब 5 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आय संभव है।

शैलेंद्र सिंह ने सरकार से अपील की है कि प्रदेश के करीब 7000 गौ-आश्रय केंद्रों में इस मॉडल को लागू किया जाए। उनका मानना है कि इससे न सिर्फ ऊर्जा उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि यह केंद्र प्रशिक्षण स्थल के रूप में भी विकसित हो सकते हैं। साथ ही, बैलों के गोबर का उपयोग गोबर गैस बनाने में किया जा सकता है, जिससे स्वच्छ और कार्बन-रहित ऊर्जा को बढ़ावा मिलेगा।

कुल मिलाकर, यह देसी तकनीक ऊर्जा संकट, पशु संरक्षण और ग्रामीण रोजगार—तीनों समस्याओं का एक साथ समाधान पेश करती है।

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