सावरकर को भारत रत्न देने की मांग पर सियासी भूचाल
कंगना रनौत बोलीं– ‘हर भारतीय के दिल की बात, विपक्ष ने बताया इतिहास का काला अध्याय
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत द्वारा वीर सावरकर को भारत रत्न दिए जाने की मांग के बाद देश की राजनीति में घमासान मच गया है। एक तरफ जहां बीजेपी और उसके समर्थक इसे राष्ट्रगौरव से जोड़ रहे हैं, वहीं विपक्षी दल इसे इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने की कोशिश बता रहे हैं।
इस विवाद के बीच बीजेपी सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत ने मोहन भागवत के बयान का खुलकर समर्थन किया है। संसद परिसर में मीडिया से बातचीत करते हुए कंगना ने कहा,
“मोहन भागवत ने वीर सावरकर के लिए जो भावना व्यक्त की है, वही भावना हर भारतीय के मन में है। वीर सावरकर भारत रत्न से बहुत ऊपर हैं, लेकिन अगर उन्हें यह सम्मान मिलता है तो यह हर देशवासी के लिए गर्व का क्षण होगा।”
विपक्ष का तीखा हमला, बताया ‘दुर्भाग्यपूर्ण’
कंगना के बयान के तुरंत बाद विपक्षी दलों ने पलटवार शुरू कर दिया। CPI(M) सांसद जॉन ब्रिटास ने कहा कि अगर वीर सावरकर को भारत रत्न दिया गया, तो यह भारत के इतिहास का एक दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय होगा।
उन्होंने आरोप लगाया कि सावरकर को आज़ादी की लड़ाई के लिए नहीं, बल्कि अंग्रेजों से माफ़ी मांगने के लिए जाना जाता है। ब्रिटास ने कहा कि सावरकर की राजनीति नफरत, ध्रुवीकरण और बंटवारे पर आधारित थी।
‘माफी मांगने वालों को सम्मान?’ – सपा का सवाल
समाजवादी पार्टी के सांसद राजीव राय ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि यदि माफी मांगने वालों को भारत रत्न देने की परंपरा शुरू हो जाती है, तो फिर ऐसे कई और नाम भी सामने आएंगे।
राजीव राय ने सवाल उठाते हुए कहा,
“क्या हम अपने बच्चों को यह सिखाना चाहते हैं कि किसी संघर्ष के समय दमनकारी ताकतों से माफी मांग लेना ही सही रास्ता है? देश की जनता ऐसी सोच को स्वीकार नहीं करेगी।”
सम्मान या सियासी संदेश?
सावरकर को भारत रत्न दिए जाने की मांग अब सिर्फ सम्मान तक सीमित नहीं रह गई है। यह मुद्दा धीरे-धीरे विचारधारा, इतिहास और राष्ट्रवाद की परिभाषा से जुड़ता जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बहस आने वाले समय में और तेज हो सकती है, क्योंकि भारत रत्न जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मान को लेकर देश पहले भी कई बार वैचारिक रूप से बंट चुका है।
बढ़ता विवाद, बढ़ती राजनीति
फिलहाल सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन जिस तरह से बयानबाज़ी तेज हुई है, उससे साफ है कि सावरकर को लेकर सियासी संग्राम अभी थमने वाला नहीं है।
अब सवाल यही है …
क्या भारत रत्न इतिहास का सम्मान बनेगा या सियासी पहचान का प्रतीक?