तमिलनाडु में सियासी दूरी के संकेत? राहुल गांधी और DMK के बीच बढ़ती चर्चाएं
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तमिलनाडु और पुडुचेरी के चुनावी माहौल के बीच कांग्रेस और डीएमके गठबंधन को लेकर नई राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। खासकर Rahul Gandhi की तमिलनाडु में अनुपस्थिति और M. K. Stalin के साथ मंच साझा न करने को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या गठबंधन में सब कुछ ठीक है।
पुडुचेरी प्रचार में दिखी दूरी
पुडुचेरी में कांग्रेस और डीएमके साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन प्रचार के दौरान दोनों नेताओं के बीच स्पष्ट दूरी देखने को मिली। राहुल गांधी ने प्रचार के आखिरी दौर में पहुंचकर रैलियां कीं, लेकिन अपने भाषण में स्टालिन का जिक्र तक नहीं किया। वहीं, स्टालिन भी उसी दिन पुडुचेरी में मौजूद थे, लेकिन दोनों के कार्यक्रम इस तरह तय किए गए कि वे एक-दूसरे से न टकराएं। राहुल ने सुबह प्रचार किया, जबकि स्टालिन शाम को पहुंचे। इस रणनीति ने राजनीतिक गलियारों में गठबंधन की मजबूती पर सवाल खड़े कर दिए।
तमिलनाडु में राहुल गांधी की गैरमौजूदगी
जहां Narendra Modi पिछले दो महीनों में तीन बार तमिलनाडु का दौरा कर चुके हैं और 15 अप्रैल को फिर से आने वाले हैं, वहीं राहुल गांधी ने अभी तक राज्य में प्रचार शुरू नहीं किया है। 2021 के विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी ने जोरदार तरीके से तीन दिवसीय दौरे के साथ अभियान की शुरुआत की थी, लेकिन इस बार उनकी देरी चर्चा का विषय बन गई है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि राहुल का दौरा 10 अप्रैल के बाद तय हो सकता है।
सीट बंटवारे को लेकर तनातनी?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर पहले हुई तनातनी का असर अब भी दिख रहा है। डीएमके के कुछ पदाधिकारियों का कहना है कि दोनों पार्टियों के बीच तालमेल में कमी नजर आ रही है। हालांकि, डीएमके के संगठनात्मक सचिव ने इन अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि दोनों दलों ने अपने-अपने कार्यक्रम पहले से तय कर लिए थे, इसलिए संयुक्त रैली संभव नहीं हो सकी।
आगे क्या होगा?
पार्टी सूत्रों के अनुसार, आने वाले दिनों में राहुल गांधी और स्टालिन एक साथ मंच साझा कर सकते हैं, जिससे गठबंधन की एकजुटता का संदेश दिया जा सके। फिलहाल, तमिलनाडु में 23 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले इन दोनों नेताओं की संयुक्त उपस्थिति पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जल्द ही दोनों नेताओं की साझा रैली नहीं होती, तो विपक्षी दल इसे मुद्दा बनाकर गठबंधन पर दबाव बढ़ा सकते हैं।