SC ने कहा: मध्यस्थता कानून में ‘टर्मिनेशन’ की अस्पष्टता दूर की जाए
UNCITRAL मॉडल कानून से चली आ रही समस्या
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को Arbitration कानून में मामलों की टर्मिनेशन प्रक्रिया को लेकर बनी लंबे समय की अस्पष्टता पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि यह समस्या 40 साल पुराने UNCITRAL मॉडल कानून से चली आ रही है, और आज भी भारतीय कानून में स्पष्टता की कमी है।
आने वाले नए बिल में भी समाधान नहीं
पीठ—जिसमें न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन शामिल थे—ने कहा कि प्रस्तावित Arbitration and Conciliation Bill, 2024 में भी यह कमी मौजूद है, जबकि यह विधेयक मौजूदा कानून को सुधारने के उद्देश्य से लाया जा रहा है।
टर्मिनेशन प्रक्रिया को स्पष्ट करने की जरूरत
अदालत ने कहा कि समय आ गया है कि 1996 के कानून में मध्यस्थता ट्रिब्यूनल द्वारा कार्यवाही समाप्त करने की शक्ति को लेकर जारी भ्रम को खत्म किया जाए।
पीठ ने सुझाव दिया कि या तो इन प्रावधानों को एक ही धारा में समेकित किया जाए, या फिर विभिन्न धाराओं में मौजूद विरोधाभासी शब्दों में संशोधन कर प्रक्रिया को साफ और एकरूप बनाया जाए।
टर्मिनेशन के बाद कोई स्पष्ट कानूनी उपाय नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि जब मध्यस्थता ट्रिब्यूनल किसी मामले को समाप्त कर देता है, तो पक्षकारों के पास कोई स्पष्ट वैधानिक उपाय (statutory remedy) नहीं बचता। इससे आगे विवाद खड़े होते हैं और अनावश्यक देरी होती है।
अदालत ने संसद से आग्रह किया कि ऐसे आदेशों के खिलाफ उपयुक्त अपील या समाधान का रास्ता कानून में सुनिश्चित किया जाए।
विशेषज्ञों की राय—सुधार से बढ़ेगी विश्वसनीयता
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी मध्यस्थता प्रणाली को अधिक पारदर्शी, भरोसेमंद और प्रभावी बनाने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकती है।
भारत में व्यावसायिक विवादों की बढ़ती संख्या के बीच एक मजबूत मध्यस्थता व्यवस्था की जरूरत पहले से ज्यादा महसूस की जा रही है।
आगामी सत्र में संसद क्या कदम उठाएगी?
अब नज़रें संसद पर हैं कि क्या वह आगामी सत्र में इन सुझावों को शामिल कर मध्यस्थता कानून को वैश्विक मानकों के अनुरूप और अधिक स्पष्ट बनाती है।