नीतीश एक बार फिर—बिहार के ‘भीष्म पितामह’ की धमाकेदार वापसी
जेपी आंदोलन से निकले नेताओं में नीतीश कुमार न तो लालू प्रसाद जैसी करिश्माई छवि रखते थे, न रामविलास पासवान जैसा व्यापक जनाधार, और न ही दिवंगत सुशील मोदी जैसा मजबूत संगठन। लेकिन इन सभी धारणाओं को एक बार फिर गलत साबित करते हुए 74 वर्षीय जेडीयू सुप्रीमो ने विधानसभा चुनाव 2025 में अपनी पार्टी को शानदार जीत दिलाई—2020 की तुलना में लगभग दोगुनी सीटें।
इस जीत ने यह साफ कर दिया कि बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश का 20 साल का शासन अब और आगे बढ़ने जा रहा है।
चुनाव से पहले: सवाल, आशंकाएँ और चर्चाएँ
चुनाव से पहले नीतीश के स्वास्थ्य को लेकर चर्चा तेज थी। मुफ्त 125 यूनिट बिजली और मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना, जिसके तहत 1 करोड़ से अधिक महिलाओं को ₹10,000 की पहली किस्त मिली, को कई लोग उनकी “बेताबी” का संकेत मान रहे थे।
कुछ विरोधियों ने कहा कि नीतीश अब ‘फ्रीबी राजनीति’ अपना रहे हैं, जबकि कई लोग भाजपा की बढ़ती ताकत से उन्हें कमजोर मान रहे थे।
लेकिन नीतीश के करीबियों का कहना था कि ये सारी चर्चाएँ वास्तविकता से दूर थीं। उदाहरण के लिए, बिजली सब्सिडी योजना में उन्होंने छतों पर सोलर पैनल लगाने का सुझाव देकर इसे दूरदर्शी रूप दिया।
और जैसे-जैसे वे चुनाव अभियान में उतरे—84 जनसभाएँ करते हुए—स्वास्थ्य को लेकर उठते सवाल पीछे छूट गए और मैदान में एक ही चीज़ गूंजती रही: “नीतीश जी ही ठीक हैं।”
महिलाओं का अभूतपूर्व समर्थन
नीतीश शासन की कई योजनाओं—साइकिल योजना, शराबबंदी, पंचायतों में 50% आरक्षण, और अब रोजगार योजना—ने महिलाओं में उनके प्रति जबरदस्त भरोसा पैदा किया।
इस बार महिलाओं ने पुरुषों से अधिक मतदान किया, वह भी ऐसे समय में जब SIR प्रक्रिया में महिला वोटरों की सर्वाधिक डिलीशन हुई थी।
बेरोजगारी से नाराज़ युवा भी नीतीश की बुनियादी सुधारों—सड़क, स्कूल, अस्पताल और कानून-व्यवस्था—के लिए उनके योगदान को स्वीकार करते दिखे।
‘जंगल राज’ से बाहर लाने का श्रेय
2005 में सत्ता संभालने के बाद नीतीश ने पहले राज्य में कानून-व्यवस्था सुधारी, फिर आधारभूत ढांचे पर काम किया।
उनका जनाधार जाति आधारित राजनीति से ऊपर उठकर बना—अति पिछड़े वर्ग (EBC), महादलित और महिलाएँ, जो मिलकर 20% से अधिक वोट बनते हैं।
कम आबादी वाली अपनी जाति (कुर्मी—4%) के बावजूद, नीतीश ने एक “कास्ट-न्यूट्रल” सामाजिक आधार तैयार किया।
युवा वोटरों को साधने की चुनौती
एक पूरी पीढ़ी के पास लालू-राबड़ी शासन की कोई याद नहीं थी। ऐसे में सवाल था—क्या नीतीश इस पीढ़ी को भी अपनी ओर मोड़ पाएँगे?
जेडीयू ने इसके लिए अपने कामों की लंबी सूची पेश की—
38 जिलों में इंजीनियरिंग कॉलेज
युवा आयोग
18–25 वर्ष के युवाओं को ₹1,000 मासिक भत्ता
पेशेवर कोर्स छात्रों के लिए क्रेडिट कार्ड
मतदान का उत्साह बताता है कि वे इसमें सफल रहे।
धीमे पड़ते कदम, लेकिन मजबूत पकड़
स्वास्थ्य और बढ़ती उम्र के बावजूद नीतीश का राजनीतिक नियंत्रण अटूट दिखता है।
2019 के बाद से पत्रकारों से उनकी मुलाकातें कम हो गई हैं, वे सलाहकारों की टीम पर अधिक निर्भर हैं—एन.के. सिंह, के.सी. त्यागी और अब संजय कुमार झा प्रमुख हैं।
बीजेपी—नीतीश समीकरण फिर मजबूत
इस बार भाजपा ने सीट बंटवारे में जेडीयू को 101 सीटों पर रोक दिया, लेकिन नीतीश ने सुनिश्चित किया कि पार्टी को मनपसंद सीटें ही मिलें।
उन्होंने भाजपा को चिराग पासवान को नियंत्रित करने के लिए भी राज़ी कर लिया और मुख्यमंत्री चेहरे के सवाल पर भाजपा को पीछे हटना पड़ा।