बिहार में चौथी हार के बाद कांग्रेस और विपक्ष में मंथन: ‘वोट चोरी’ बनाम ‘जनादेश का सम्मान

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बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए की ऐतिहासिक जीत ने कांग्रेस और व्यापक विपक्ष को गहरी निराशा और असमंजस में डाल दिया है। कांग्रेस के भीतर ही प्रमुख नेताओं द्वारा एक-दूसरे से अलग बयान दिए जाने से पार्टी की रणनीति और नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।

कांग्रेस संचार विभाग के प्रमुख जयराम रमेश ने परिणामों को “विशाल स्तर पर वोट चोरी” का नतीजा बताया। उनके अनुसार यह “वोट चोरी” प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और चुनाव आयोग द्वारा रची गई। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने किसी भी तरह की धांधली का उल्लेख किए बिना कहा कि पार्टी जनता के जनादेश का सम्मान करती है और परिणामों की विस्तृत समीक्षा करेगी।
राहुल गांधी ने भी कहा कि परिणाम “चौंकाने वाले” हैं और चुनाव “शुरुआत से ही निष्पक्ष नहीं थे”, लेकिन उन्होंने भी प्रत्यक्ष रूप से “वोट चोरी” शब्द का उपयोग नहीं किया।

इन विरोधाभासी प्रतिक्रियाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस आज सबसे बड़े प्रश्न से जूझ रही है—विपक्ष भाजपा की लगातार जीतों के सामने एक कारगर और एकजुट कथा कैसे गढ़े?

महागठबंधन की करारी हार: कारण और भीतर की नाराज़गी

बिहार में कांग्रेस 19 से घटकर सिर्फ 6 सीटों पर सिमट गई, जबकि आरजेडी भी अपने 15 साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार विपक्ष के पास कोई स्पष्ट और सामूहिक नैरेटिव नहीं था।
कांग्रेस ‘SIR’ और वोट चोरी के मुद्दे पर केंद्रित रही, जबकि तेजस्वी यादव ने रोजगार को मुख्य विषय बनाया। संयुक्त अभियान नाम का था, ज़मीन पर नहीं। यह स्थिति महाराष्ट्र और हरियाणा जैसी ही रही, जहां विपक्ष एकजुटता दिखाने में विफल रहा।

कई कांग्रेस नेताओं ने माना कि चुनाव से ठीक पहले एनडीए द्वारा चलाई गई जीविका योजना के तहत ₹10,000 नकद हस्तांतरण ने लोगों के बीच भरोसा पैदा किया। हालांकि उनका कहना है कि केवल वेलफेयर योजनाओं को हार के लिए ज़िम्मेदार ठहराना गलत होगा।

पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने राहुल गांधी की रणनीति पर भी सवाल उठाया। एक नेता ने कहा—
“वोट चोरी या SIR चुनावी मुद्दा ही नहीं था। राहुल गांधी 2019 के ‘चौकीदार चोर है’ की तरह अब ‘वोट चोरी’ पर अटक गए हैं, जिसका कोई असर नहीं दिखा।”

दूसरे नेता के अनुसार पार्टी जनता के वास्तविक मुद्दों से कट गई है और सिर्फ वैचारिक रूप से बीजेपी-विरोधी लोगों के वोट तक सीमित रह गई है।

कास्ट सेंसेस से लेकर रोज़गार—कई मुद्दे बेअसर

कांग्रेस और आरजेडी की सामाजिक न्याय की राजनीति भी असर नहीं दिखा सकी। बिहार में पहले ही जाति गणना हो चुकी है और केंद्र ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर करने की घोषणा कर दी है, जिससे यह मुद्दा फीका पड़ गया।
वहीं, रोजगार की तेजस्वी की बात आकर्षक थी, पर लोगों को डिलीवरी पर भरोसा नहीं था। ‘जंगलराज’ की छवि भी आरजेडी के खिलाफ गई।

विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाएँ

शशि थरूर ने कहा कि परिणाम “बेहद निराशाजनक” हैं और संगठनात्मक व रणनीतिक स्तर पर गंभीर समीक्षा की जरूरत है।

डी.के. शिवकुमार ने इसे बड़ी “सीख” बताते हुए INDIA गठबंधन के लिए नई रणनीति का संकेत दिया।

अखिलेश यादव ने SIR को “चुनावी साजिश” बताते हुए कहा कि अब विपक्ष चौकन्ना रहेगा।

एनसीपी (एसपी) की सुप्रिया सुले ने नतीजों का श्रेय नीतीश कुमार को दिया।

शिवसेना (UBT) के नेता अंबादास दानवे ने कांग्रेस पर सीटों की मांग अधिक करने पर तंज कसा और कहा कि कांग्रेस जितनी सीटें लेती है, उतनी जीत नहीं पाती।

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