यूसीसी पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, कहा– अब गंभीरता से विचार का समय
Mediawali news, Delhi
नई दिल्ली। Supreme Court of India ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि अब इस विषय पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यूसीसी लागू करने या शरिया कानून में बदलाव जैसे मुद्दों पर अंतिम फैसला संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है।
शरियत कानून की धाराओं को चुनौती पर सुनवाई
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ ने की। इस पीठ में न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi और R Mahadevan भी शामिल थे। अदालत Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937 की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में दावा किया गया है कि इस कानून के कुछ प्रावधान मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं।
महिलाओं के अधिकारों पर कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यदि न्यायालय शरियत कानून के उत्तराधिकार संबंधी प्रावधानों को अचानक रद्द कर देता है, तो इससे कानूनी खालीपन पैदा हो सकता है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने वरिष्ठ अधिवक्ता Prashant Bhushan से पूछा कि यदि 1937 का कानून समाप्त हो जाता है तो उसकी जगह कौन-सा कानून लागू होगा। उन्होंने कहा कि जल्दबाजी में ऐसा फैसला नहीं होना चाहिए जिससे महिलाओं को वर्तमान से भी कम अधिकार मिल जाएं।
संसद को बताया सही मंच
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि याचिका में भेदभाव का मुद्दा मजबूत दिखाई देता है, लेकिन इस विषय पर व्यापक फैसला लेने के लिए संसद अधिक उपयुक्त मंच है। संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में भी समान नागरिक संहिता लागू करने की जिम्मेदारी विधायिका को दी गई है।
याचिकाकर्ता की दलील
सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने दलील दी कि अदालत यह घोषित कर सकती है कि मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के बराबर उत्तराधिकार अधिकार मिलना चाहिए। उनका कहना था कि यदि विवादित धाराएं हटाई जाती हैं तो ऐसे मामलों में Indian Succession Act लागू किया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत कानूनों में व्यापक सुधार के लिए विधायी प्रक्रिया सबसे उचित रास्ता है।