सिंधु जल संधि पर भारत का सख्त रुख
भारत ने इंडस वाटर ट्रीटी (सिंधु जल संधि) से जुड़े एक अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के आदेश को मानने से साफ इनकार कर दिया है। भारत का कहना है कि यह अदालत अवैध रूप से गठित की गई है और इसके ढांचे को भारत किसी भी तरह की मान्यता नहीं देता। भारत ने इसे अधिकारहीन और असंवैधानिक करार दिया है।
अंतरराष्ट्रीय अदालत का आदेश
कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने भारत से उसके हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स—विशेष रूप से बैगलीहर और किशनगंगा परियोजनाओं—के ऑपरेशन रिकॉर्ड और पोंटेज लॉगबुक पेश करने को कहा था। अदालत का कहना था कि इन दस्तावेजों का उपयोग आगे की सुनवाई में किया जाएगा। इसके लिए 9 फरवरी 2026 तक दस्तावेज जमा करने या अनुपालन न करने पर औपचारिक स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया गया।
भारत का इनकार और कानूनी दलील
भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस पूरी प्रक्रिया को वैध नहीं मानता और इसमें किसी भी स्तर पर भाग नहीं लेगा। सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह तथाकथित अदालत सिंधु जल संधि के तय ढांचे के बाहर बनाई गई है, इसलिए इसके आदेश भारत पर बाध्यकारी नहीं हैं।
संधि की स्थिति ‘अस्थायी रूप से लंबित’
भारत का कहना है कि सिंधु जल संधि की वैधता फिलहाल अस्थायी रूप से लंबित है, ऐसे में उसके तहत किसी तरह का कानूनी दायित्व बनता ही नहीं। भारत पहले ही इस संधि को अस्थायी रूप से निलंबित कर चुका है।
आतंकवाद को बताया वजह
भारत ने 23 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का हवाला देते हुए संधि को सस्पेंड करने की घोषणा की थी। भारत का आरोप है कि पाकिस्तान की ओर से लगातार सीमापार आतंकवादी गतिविधियां संधि के मूल उद्देश्यों और आपसी भरोसे को नुकसान पहुंचा रही हैं।
पाकिस्तान की प्रतिक्रिया और बढ़ता तनाव
पाकिस्तान ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाते हुए भारत से संधि के पालन की मांग की है। वहीं भारत का कहना है कि कोई भी अंतरराष्ट्रीय समझौता तभी टिक सकता है जब शांति और विश्वास का माहौल हो। विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद अब तकनीकी जल-साझाकरण से आगे बढ़कर भारत-पाक संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है।