संचार साथी ऐप पर बढ़ा विवाद: सुरक्षा के नाम पर निगरानी का खतरा?

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सरकार के संचार साथी एप को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। विपक्ष का आरोप है कि यह ऐप नागरिकों की निगरानी करने का एक नया तरीका है, जबकि सरकार इसे डिजिटल सुरक्षा प्रोजेक्ट बता रही है। प्रियंका गांधी ने इसे “जासूसी ऐप” कहा है और कहा कि इससे लोगों की प्राइवेसी खतरे में पड़ सकती है।

संचार साथी ऐप क्या है?

यह केंद्र सरकार द्वारा जनवरी 2025 में लॉन्च किया गया डिजिटल सेफ्टी ऐप है। इसे गूगल प्ले स्टोर, ऐप स्टोर और वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है। ऐप कई सुविधाएं देता है, जैसे—

  • खोए या चोरी हुए फोन को ब्लॉक करना

  • IMEI नंबर चेक करके फोन की असलियत जानना

  • अपने नाम पर चल रहे सभी मोबाइल नंबर देखना

  • संदिग्ध कॉल या मैसेज की शिकायत करना

सरकार का दावा है कि इस ऐप का मकसद साइबर ठगी रोकना है।

विवाद क्यों बढ़ा?

1 दिसंबर की प्रेस रिलीज़ में कहा गया कि—
हर नए फोन में संचार साथी ऐप पहले से इंस्टॉल रहेगा और इसे हटाया नहीं जा सकेगा।”

इसके बाद सोशल मीडिया पर ऐप की परमिशन लिस्ट वायरल हुई। उसमें कैमरा, माइक, मैसेज, कॉल लॉग, लोकेशन और कीबोर्ड एक्सेस जैसी संवेदनशील अनुमतियां दिखाई दीं।

विपक्ष के बड़े आरोप:
  • प्रियंका गांधी: “यह जासूसी ऐप है, लोगों की निजता पर हमला है।”

  • जयराम रमेश: “डिजिटल डिक्टेटरशिप शुरू हो गई है।”

  • महुआ मोइत्रा: “सरकार हर कॉल सुनना चाहती है।”

क्या यह ऐप जासूसी कर सकता है?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके पास इतनी परमिशन है कि यह—

  • आपको सुन सकता है

  • आपके मैसेज और OTP पढ़ सकता है

  • आपकी लोकेशन ट्रैक कर सकता है

  • आपके फोन के फोटो और फाइल एक्सेस कर सकता है

यह डेटा DoT के सर्वर पर स्टोर होता है और “कानूनी जरूरत पर” एजेंसियों को दिया जा सकता है।

डेटा कितने समय तक रखा जाएगा?

ऐप की प्राइवेसी पॉलिसी में इसका साफ जिक्र नहीं है। सिर्फ इतना लिखा है कि डेटा सुरक्षित रखा जाएगा और जरूरत पड़ने पर शेयर किया जा सकेगा। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि पारदर्शिता की कमी प्राइवेसी रिस्क बढ़ाती है।

क्या यह ऐप बिना कुछ परमिशन के भी चल सकता है?

ऐप के मुख्य फीचर चलाने के लिए केवल—

  • IMEI

  • कॉल/SMS स्थिति

  • लोकेशन

  • नेटवर्क एक्सेस

की जरूरत होती है।
लेकिन ऐप कैमरा, माइक, स्टोरेज और कीबोर्ड जैसी अतिरिक्त परमिशन भी मांगता है, जिनका उपयोग अस्पष्ट है।

क्या पहले भी ऐसे जासूसी मामलों के आरोप लगे हैं?
  • 2023 में Pegasus स्पाइवेयर विवाद सामने आया था।

  • यह पत्रकारों, नेताओं और एक्टिविस्ट्स की जासूसी कर सकता था।

  • हालांकि Pegasus छुपकर फोन में घुसता था, जबकि संचार साथी एक सरकारी ऐप है जिसे ओपन तौर पर लॉन्च किया गया है।

विपक्ष का आरोप है कि इसका उपयोग भी निगरानी के लिए हो सकता है।

क्या ऐप अनइंस्टॉल किया जा सकेगा?

शुरू में कहा गया था कि इसे नहीं हटाया जा सकेगा।
लेकिन बाद में मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने साफ किया कि—

“यूजर्स ऐप को अनइंस्टॉल कर सकेंगे।”

मोबाइल कंपनियों पर क्या असर?

  • 90 दिनों में सभी नए फोन में इसे प्री-इंस्टॉल करना होगा।

  • पुराने फोन में सॉफ्टवेयर अपडेट से इंस्टॉल होगा।

  • एपल के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि उनकी पॉलिसी सरकारी ऐप प्री-इंस्टॉल की अनुमति नहीं देती।

कई कंपनियां और प्राइवेसी ग्रुप कोर्ट जाने की तैयारी में हैं।

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