पुराने वाहन के फिटनेस पर अब 10 गुना अधिक लगेगा शुल्क, केंद्र सरकार का बड़ा फैसला

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2.5 हजार से सीधे 25,000 रूपए

केंद्र सरकार ने वाहन फिटनेस टेस्ट की फीस में बड़ा बदलाव किया है, और इसका सबसे सीधा असर उन आम लोगों पर पड़ने वाला है जो कई साल पुरानी कार, बाइक या कमर्शियल व्हीकल चलाते हैं। नए नियमों के अनुसार, अब 10 साल के बाद हर वाहन को फिटनेस टेस्ट कराना अनिवार्य हो गया है, और जैसे-जैसे वाहन की उम्र बढ़ेगी, वैसे-वैसे उसकी फिटनेस फीस भी बढ़ती जाएगी।

यानी अगर किसी की कार 10 से 15 साल पुरानी है तो एक रेट लगेगा, 15 से 20 साल पर अधिक रेट और 20 साल से ज्यादा होने पर सबसे ज्यादा चार्ज देना होगा। सरकार का कहना है कि यह कदम सड़क सुरक्षा बढ़ाने और प्रदूषण कम करने के लिए जरूरी है, लेकिन आम जनता और ट्रांसपोर्ट सेक्टर के लिए यह फैसला बड़ा आर्थिक झटका साबित हो सकता है।

भारत में पुरानी गाड़ियों पर सख्ती की शुरुआत अचानक नहीं हुई…

  • 2000 के दशक में दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण बढ़ने के बाद सबसे पहले पुरानी डीज़ल और पेट्रोल गाड़ियों पर रोक लगाने की बहस शुरू हुई।

  • 2015 में NGT (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) ने 10 साल पुरानी डीज़ल और 15 साल पुरानी पेट्रोल कारों को दिल्ली में चलाने पर रोक लगा दी।

  • इसके बाद 2021 में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय वाहन स्क्रैपेज नीति (Vehicle Scrappage Policy) शुरू की, जिसमें पुरानी गाड़ियाँ स्वेच्छा से स्क्रैप करवाने पर छूट और लाभ देने की बात कही गई।

सरकार का मानना है कि भारत में करीब 51 लाख हल्की गाड़ियाँ और 34 लाख भारी वाहन ऐसे हैं जिनकी उम्र 15 साल से अधिक है। इनमें से बड़ी संख्या बिना फिटनेस जांच के सड़क पर चलती है, जो दुर्घटना और प्रदूषण दोनों के लिए जिम्मेदार मानी जाती है। इसी वजह से अब फिटनेस फीस को इतना महंगा कर दिया गया है कि लोग स्वाभाविक रूप से पुरानी गाड़ियाँ बदलने पर मजबूर हों।

सबसे ज्यादा संकट ट्रक, बस और टैक्सी मालिकों पर है…

  • 20 साल से ज्यादा पुराने ट्रक के लिए पहले फिटनेस फीस 2,500 रुपये थी, जो अब 25,000 रुपये हो गई है।

  • मीडियम कमर्शियल व्हीकल में यह फीस 1,800 रुपये से बढ़कर 20,000 रुपये हो गई है।

छोटे शहरों और गाँवों में जहां लोग 15–20 साल पुरानी कारें या जीप चलाते हैं, उनकी आर्थिक स्थिति पर भी इसका बड़ा असर पड़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में कई परिवार दूसरी–तीसरी हाथ की गाड़ियों पर निर्भर होते हैं, जिनकी उम्र पहले से ही 10–15 साल के बीच होती है। ऐसे में हर साल भारी-भरकम फिटनेस फीस देना उनके लिए मुश्किल होगा।

यह फैसला केवल फीस बढ़ाने का मुद्दा नहीं है; इसके कई राष्ट्रीय स्तर के प्रभाव होंगे:

1. पुरानी गाड़ियाँ तेज़ी से स्क्रैप होंगी

अगर फीस इतनी महंगी होगी कि वाहन रखना घाटे का सौदा लगे, तो लोग स्वाभाविक रूप से गाड़ियाँ स्क्रैप करवाने लगेंगे। इससे स्क्रैप रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री को बढ़ावा मिलेगा।

2. नई कारों की बिक्री बढ़ सकती है

ऑटोमोबाइल कंपनियों को इसका फायदा मिलेगा, क्योंकि लोग मजबूरी में नई गाड़ियाँ खरीदेंगे।

3. प्रदूषण स्तर में सुधार संभव

पुरानी गाड़ियों से सबसे अधिक धुआँ और कार्बन उत्सर्जन होता है। अगर पुराने वाहन कम होंगे तो शहरों में प्रदूषण कम हो सकता है।

4. महंगाई और ट्रांसपोर्ट कॉस्ट बढ़ सकती है

ट्रक और बस ऑपरेटर्स अतिरिक्त खर्च को किराए और मालभाड़े पर डालेंगे, जिससे चीजें महंगी हो सकती हैं।

जनता के लिए फैसला कितना भारी?

सरकार इसे “सुरक्षा और पर्यावरण” का कदम बताती है, लेकिन सामान्य जनता के लिए इसका सीधा मतलब है. पुरानी गाड़ियाँ रखने का खर्च कई गुना बढ़ चुका है। जो लोग 10–20 साल पुरानी गाड़ी चलाते हैं, उन्हें नया बजट बनाना पड़ेगा या तो फिटनेस फीस दें या गाड़ी बदलें।यह फैसला देश की सड़क सुरक्षा और ग्रीन पॉलिसी के हिसाब से तो महत्वपूर्ण है, लेकिन आम जनता, छोटे कारोबारियों और ट्रांसपोर्टर्स के लिए आने वाले समय में बड़ा आर्थिक बोझ भी बन सकता है।

Anjali Priya
Anjali Priya
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