परिसीमन 2026: ‘I-YUVA फॉर्मूला’ के साथ संतुलित लोकतंत्र की नई दिशा
Mediawali news
भारत में 2026 का परिसीमन एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया से कहीं अधिक व्यापक महत्व रखता है। यह वह निर्णायक क्षण है जहाँ देश को यह तय करना है कि संसदीय प्रतिनिधित्व केवल जनसंख्या के आधार पर निर्धारित होगा या फिर उसमें विकास, भूगोल और नीतिगत प्रयासों को भी समान महत्व दिया जाएगा। दशकों से स्थगित इस प्रक्रिया के पुनः आरंभ होते ही राष्ट्रीय स्तर पर एक गंभीर बहस उभर आई है—क्या जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को राजनीतिक रूप से नुकसान उठाना पड़ेगा, और क्या दुर्गम व सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्रों की आवाज़ कमजोर हो जाएगी। इन्हीं जटिल सवालों के समाधान के रूप में रुद्र प्रताप सिंह द्वारा प्रस्तुत ‘I-YUVA फॉर्मूला’ तेजी से नीति विमर्श के केंद्र में आता जा रहा है। I-YUVA संस्था के संस्थापक और राजनीतिक विश्लेषक के रूप में उन्होंने जो मॉडल प्रस्तावित किया है, वह केवल सीटों का गणित नहीं, बल्कि भारत की विविधता को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व की रूपरेखा प्रस्तुत करता है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जहाँ उत्तर-दक्षिण असंतुलन की आशंकाएँ गहराती जा रही हैं, यह फॉर्मूला एक व्यवहारिक और समावेशी समाधान के रूप में उभर रहा है।
‘I-YUVA फॉर्मूला’ का मूल आधार त्रि-स्तरीय प्रतिनिधित्व प्रणाली है, जो भारत की भौगोलिक और विकासात्मक विषमता को स्वीकार करता है। इसके अनुसार पर्वतीय और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में प्रति 6 लाख की जनसंख्या पर एक सांसद का प्रावधान, दक्षिण भारत के लिए 9 लाख पर एक सांसद, और मैदानी व शेष भारत के लिए 13 लाख पर एक सांसद का सुझाव दिया गया है। यह 6:9:13 का अनुपात केवल संतुलन बनाने का प्रयास नहीं, बल्कि उन वास्तविकताओं को मान्यता देता है जहाँ एक तरफ दुर्गम क्षेत्रों में प्रशासनिक चुनौतियाँ हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण और मानव विकास में उल्लेखनीय प्रगति की है।
वर्तमान समाचार और राजनीतिक चर्चाओं में यह मुद्दा प्रमुखता से उठ रहा है कि यदि परिसीमन केवल जनसंख्या-आधारित रहा, तो दक्षिण भारत की संसदीय हिस्सेदारी में कमी आ सकती है, जिससे क्षेत्रीय असंतोष बढ़ने की संभावना है। ऐसे समय में I-YUVA का यह मॉडल दक्षिण के विकास को ‘डेमोग्राफिक बोनस’ के रूप में संरक्षित करने का प्रयास करता है, साथ ही उत्तर और मध्य भारत की विशाल जनसंख्या को भी उचित प्रतिनिधित्व देने का संतुलन स्थापित करता है। प्रस्तावित 1,230 सीटों वाली संसद में दक्षिण की हिस्सेदारी लगभग 24.8% बनाए रखने का सुझाव इसी संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इस फॉर्मूले की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसका सामाजिक और लैंगिक न्याय पर जोर है। महिला आरक्षण कानून के लागू होने के साथ, इस विस्तारित संसद में 33% महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने का विचार इसे वैश्विक स्तर पर एक ऐतिहासिक उदाहरण बना सकता है। साथ ही अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों के लिए जनसंख्या अनुपात के अनुसार आरक्षण का प्रावधान सामाजिक न्याय को और मजबूत करता है। विशेष रूप से पर्वतीय और आदिवासी क्षेत्रों में छोटे प्रतिनिधित्व मानक से स्थानीय नेतृत्व को राष्ट्रीय मंच पर अधिक अवसर मिलने की संभावना है।
‘I-YUVA फॉर्मूला’ की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह विकास को सीधे राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़ता है। जो राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करते हैं, उन्हें इस मॉडल में प्रोत्साहन मिलता है। इससे नीति-निर्माण की दिशा भी सकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकती है, क्योंकि राज्य केवल अधिक जनसंख्या के आधार पर नहीं, बल्कि बेहतर शासन के आधार पर भी अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास करेंगे।
राजनीतिक रूप से भी यह मॉडल एक व्यावहारिक मध्य मार्ग प्रस्तुत करता है। जहाँ एक ओर जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व की मांग को पूरी तरह नकारा नहीं गया है, वहीं दूसरी ओर संघीय ढांचे और क्षेत्रीय संतुलन को बनाए रखने की स्पष्ट कोशिश दिखाई देती है। यही कारण है कि परिसीमन 2026 को लेकर चल रही राष्ट्रीय बहस में I-YUVA और रुद्र प्रताप सिंह का यह प्रस्ताव एक गंभीर वैकल्पिक दृष्टिकोण के रूप में उभर रहा है।
अंततः, परिसीमन 2026 भारत के लोकतंत्र की दिशा तय करने वाला क्षण होगा। ऐसे में ‘I-YUVA फॉर्मूला’ केवल एक प्रस्ताव नहीं, बल्कि एक संतुलित, समावेशी और दूरदर्शी लोकतंत्र की ओर बढ़ने का रोडमैप प्रस्तुत करता है—जहाँ न केवल जनसंख्या, बल्कि विकास, भूगोल और सामाजिक न्याय सभी को समान महत्व दिया जाए। यह पहल इस बात को सुनिश्चित करने का प्रयास है कि भारत का हर क्षेत्र, हर वर्ग और हर नागरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में समान रूप से सहभागी बन सके।