मकर संक्रांति पर नोएडा में कतरनी चूड़ा की मिठास, बिहार से जुड़ी यादों ने बढ़ाई बाजार की रौनक

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त्योहार के साथ लौटती हैं गांव और घर की यादें

मकर संक्रांति आते ही नोएडा के बाजारों में एक अलग ही रौनक देखने को मिलती है। दुकानों पर भीड़, फोन पर ऑर्डर और पैकेट में सजी एक खास पहचान—भागलपुर का प्रसिद्ध कतरनी चूड़ा। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से जुड़े हजारों परिवारों के लिए मकर संक्रांति केवल त्योहार नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और परंपराओं से जुड़ने का अवसर होती है। यही वजह है कि इस समय नोएडा में दही-चूड़ा, तिलकुट, तिल की लाई और गुड़ की मांग तेजी से बढ़ जाती है।

जीआई टैग मिलने से बढ़ा भरोसा

शहर के थोक व्यापारियों के अनुसार, मकर संक्रांति से करीब दो हफ्ते पहले ही कतरनी चूड़ा की बिक्री शुरू हो जाती है। व्यापारी नरेश कुच्छल बताते हैं कि भागलपुर के कतरनी चूड़ा को जीआई टैग मिलने के बाद ग्राहकों का भरोसा और मजबूत हुआ है। अब लोग सामान्य चूड़े की बजाय खास तौर पर कतरनी चूड़ा ही मांगते हैं। यह चूड़ा पैकेट बंद और थोक दोनों रूपों में बाजार में उपलब्ध है।

नोएडा से देश के बड़े शहरों तक सप्लाई

कतरनी चूड़ा की मांग केवल नोएडा तक सीमित नहीं है। यहां से इसकी सप्लाई मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे बड़े महानगरों में रहने वाले प्रवासी परिवारों तक की जाती है। कई लोग इसे ऑनलाइन या परिचित व्यापारियों के माध्यम से मंगवाते हैं, ताकि त्योहार का स्वाद वैसा ही रहे जैसा गांव या घर में मिलता था। सेक्टर-110 के व्यापारी सौरभ सिंघल बताते हैं कि अब स्थानीय लोग भी इसके स्वाद और गुणवत्ता को पसंद करने लगे हैं।

15 दिन पहले ही बढ़ जाती है बुकिंग

नोएडा सेक्टर-104 के व्यवसायी सौरभ सिंघल के अनुसार, मकर संक्रांति से करीब 15 दिन पहले ही कतरनी चूड़ा की बुकिंग शुरू हो जाती है। बिहार और पूर्वी यूपी के लोग बड़ी संख्या में नोएडा में रहते हैं। मकर संक्रांति पर दही-चूड़ा खाने की परंपरा है, इसलिए लोग इसे अपने परिवार के साथ-साथ रिश्तेदारों और दोस्तों को भेजने के लिए भी खरीदते हैं।

इलाकों के हिसाब से बदलता है स्वाद

मकर संक्रांति मनाने के तरीके हर क्षेत्र में अलग हैं। बिहार के गया जिले में कतरनी चूड़ा के साथ तिलकुट और गुड़ की मिठाइयों की मांग रहती है। मधुबनी और दरभंगा में दही-चूड़ा के साथ मौसमी फल और तिल से बनी चीजें परोसी जाती हैं। पूर्वी यूपी में चूड़ा, दही और गुड़ लोकप्रिय हैं, जबकि पश्चिमी यूपी में खिचड़ी, दान-पुण्य और तिल-गुड़ का विशेष महत्व होता है।

स्वयं सहायता समूहों को मिल रहा रोजगार

कतरनी चूड़ा की बढ़ती मांग के बीच ग्रेटर नोएडा के कुछ इलाकों में स्वयं सहायता समूहों की भूमिका भी अहम हो गई है। ये समूह व्यापारियों के साथ मिलकर चूड़ा की पैकिंग, वजन और स्थानीय सप्लाई का काम संभालते हैं। इससे न केवल मांग पूरी हो रही है, बल्कि महिलाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार भी मिल रहा है।

सेहत के लिए भी लाभकारी

विशेषज्ञों के अनुसार, कतरनी चूड़ा ठंड के मौसम में शरीर के लिए फायदेमंद होता है। इसमें मौजूद कार्बोहाइड्रेट ऊर्जा देता है। दही और गुड़ के साथ सेवन करने से पाचन बेहतर रहता है, जबकि तिल और गुड़ आयरन व कैल्शियम की पूर्ति करते हैं।
अजय राणा, सीएमएस, जिला अस्पताल नोएडा के अनुसार, बुजुर्गों और बच्चों के लिए भी यह संतुलित और पौष्टिक आहार माना जाता है।

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