कानपुर के 1857 क्रांति नायक सूबेदार टिक्का सिंह के स्मारक को लेकर लोगों ने उठाई आवाज
स्थानीय लोगों ने विधायक को सौंपा ज्ञापन
कानपुर नगर। 1857 की क्रांति के महान नायक सूबेदार टिक्का सिंह के स्मारक निर्माण की मांग को लेकर स्थानीय लोगों ने बिल्हौर विधायक राहुल बच्चा सोनकर को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में कहा गया कि टिक्का सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में अहम भूमिका निभाई, लेकिन आज उनकी वीरगाथा को वह पहचान नहीं मिल पा रही है जिसके वे हकदार हैं।
कानपुर के पहले विद्रोह की चिंगारी
आजादी की लड़ाई में कानपुर का एक ऐसा क्रांतिकारी नायक भी था, जिसके इशारे पर पहली बार विद्रोह की चिंगारी भड़की और अंग्रेजों की नींव हिल गई। यह नायक थे सूबेदार टिक्का सिंह। उनके नेतृत्व में कानपुर कुछ समय के लिए अंग्रेजों से आजाद हो गया था। अंग्रेजों के खिलाफ जीत के बाद नाना साहब ने उन्हें जनरल पद देकर घुड़सवार सेवा का कमांडर नियुक्त किया था।
मेरठ से कानपुर तक विद्रोह का विस्तार
10 मई 1857 को मेरठ में शुरू हुआ विद्रोह जल्द ही कानपुर पहुंच गया। 21 मई को कुछ सिपाहियों ने यहां विद्रोह कर दिया, जिसके बाद अंग्रेजी शासन ने कई सिपाहियों को फांसी दे दी। जैसे-जैसे कानपुर में विद्रोह तेज हुआ, अंग्रेज मजिस्ट्रेट होल्डर्सन ने 26 मई को नाना साहब से खजाने की सुरक्षा के लिए मदद मांगी।
4 जून की ऐतिहासिक रात
अंग्रेजों की पिकेट ड्यूटी पर तैनात सूबेदार टिक्का सिंह के संकेत पर 4 जून 1857 की आधी रात भारतीय सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। नवाबगंज स्थित अंग्रेजों के खजाने से करीब एक लाख रुपये लूटे गए। 6 जून को नाना साहब के नेतृत्व में विद्रोही सिपाहियों ने जनरल ह्वीलर द्वारा बनाए गए अस्थायी किले पर हमला किया।
21 दिन की घेराबंदी और आजादी
किले पर 21 दिन तक गोले बरसाए गए। अंग्रेजों के पास पीने के पानी के लिए सिर्फ एक कुआं था। अंततः 25 जून को जनरल ह्वीलर ने आत्मसमर्पण कर दिया और कानपुर अंग्रेजों से आजाद हो गया। हालांकि 17 जुलाई को अंग्रेजों ने कूटनीति के जरिए दोबारा कब्जा कर लिया।
इतिहास में दर्ज, पहचान अभी बाकी
कानपुर नगर परिक्रमा पुस्तक में टिक्का सिंह का उल्लेख मिलता है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि वे किस सेना से जुड़े थे, लेकिन अन्य स्रोत बताते हैं कि वे अंग्रेजी सेना में रहते हुए भी भारतीय विद्रोहियों के साथ खड़े थे। स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे वीर योद्धा के सम्मान में स्मारक बनना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके बलिदान को जान सकें।