डिजिटल एडिक्शन बना युवाओं की नई बीमारी, हर हफ्ते 3–5 केस पहुंच रहे जिला अस्पताल

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नोएडा।
डिजिटल युग में जहां मोबाइल फोन ने कामकाज और लेनदेन को आसान बनाया है, वहीं इसका बढ़ता और अनियंत्रित इस्तेमाल अब युवाओं के लिए गंभीर मानसिक समस्या बनता जा रहा है। जिले के सरकारी अस्पताल में हर सप्ताह 3 से 5 युवा डिजिटल एडिक्शन की शिकायत लेकर मनोवैज्ञानिक के पास पहुंच रहे हैं। इनमें सबसे अधिक संख्या 14 से 19 वर्ष की उम्र के किशोरों की है।

जिला अस्पताल की मनोवैज्ञानिक डॉ. स्वाति त्यागी के अनुसार, लगातार मोबाइल इस्तेमाल के कारण पढ़ाई, घर के काम और जिम्मेदारियों को टालने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। इसका सीधा असर युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है, जिससे एंजाइटी, स्ट्रेस और चिड़चिड़ापन जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं।

डॉ. त्यागी का कहना है कि अगर बच्चा ज्यादा मोबाइल देखता है तो उसे डांटना, मना करना या जिद्दी कहना सही तरीका नहीं है। इसके बजाय बच्चों को समय देना, उनसे बातचीत करना और उन्हें ध्यान से सुनना ज्यादा जरूरी है। बच्चों को खुलकर बोलने के लिए प्रोत्साहित करने से उनका आत्म-सम्मान बढ़ता है और माता-पिता के साथ उनका रिश्ता मजबूत होता है, जिससे बदलाव को स्वीकार करना आसान हो जाता है।

केस स्टडी 1

रातभर गेमिंग, दिन में चिड़चिड़ापन

नोएडा सेक्टर-22 निवासी 16 वर्षीय छात्र पिछले छह महीनों से ऑनलाइन गेमिंग का आदी हो गया था। रात में 3–4 बजे तक मोबाइल पर गेम खेलने के कारण उसकी नींद पूरी नहीं हो पा रही थी। स्कूल में ध्यान नहीं लगता था और घर में बात-बात पर झगड़ा होने लगा। जब पढ़ाई पूरी तरह नजरअंदाज होने लगी, तब परिजन उसे जिला अस्पताल के मनोवैज्ञानिक विभाग लेकर पहुंचे। जांच में अत्यधिक एंजाइटी और स्ट्रेस सामने आया। दवा और हर तीन दिन में काउंसलिंग सेशन के बाद करीब एक महीने में उसके व्यवहार में सकारात्मक बदलाव दिखाई देने लगे।

केस स्टडी 2

रील्स स्क्रॉलिंग ने बढ़ाई एंजाइटी

ग्रेटर नोएडा की 13 वर्षीय छात्रा घंटों सोशल मीडिया पर रील्स और शॉर्ट वीडियो स्क्रॉल करती रहती थी। मोबाइल से दूर होते ही उसे बेचैनी, घबराहट और अकेलापन महसूस होता था। परीक्षा के समय भी वह पढ़ाई के बजाय मोबाइल उठाने को मजबूर हो जाती थी। धीरे-धीरे आत्मविश्वास कम होने लगा और तनाव बढ़ गया। परिवार को डॉक्टर तक ले जाने में भी काफी मुश्किल हुई, लेकिन ऑनलाइन और आमने-सामने सेशन के जरिए काउंसलिंग शुरू होने पर उसकी हालत में सुधार आने लगा। छोटी-छोटी अच्छी आदतों पर रिवॉर्ड देने की तकनीक ने उसे डिजिटल एडिक्शन से बाहर निकालने में मदद की।

केस स्टडी 3

काम टालने की आदत बनी बड़ी परेशानी

नोएडा के एक गांव से आए 15 वर्षीय किशोर में मोबाइल पर वीडियो देखने की लत इतनी बढ़ गई कि वह हर काम को बाद में टालने लगा। होमवर्क, खेलना और परिवार के साथ समय बिताना लगभग बंद हो गया। समय पर काम न करने की आदत ने उसके स्वभाव में गुस्सा और चिड़चिड़ापन बढ़ा दिया, जिससे घर का माहौल भी प्रभावित होने लगा।

समस्या को कैसे पहचानें

डॉ. स्वाति त्यागी के अनुसार, अगर बच्चा या युवा मोबाइल से दूर होने पर बेचैन हो जाए, रात में देर तक स्क्रीन देखे, पढ़ाई या रोजमर्रा के काम टालने लगे और छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगे, तो ये डिजिटल एडिक्शन के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से नींद की समस्या, ध्यान की कमी और मानसिक तनाव बढ़ता है, जो आगे चलकर गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या का रूप ले सकता है।

अभिभावकों और युवाओं के लिए सलाह

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मोबाइल इस्तेमाल के लिए समय सीमा तय करना, सोने से पहले फोन से दूरी बनाना, खेल-कूद, किताब पढ़ने और परिवार के साथ समय बिताने जैसी आदतों को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है।
— डॉ. स्वाति त्यागी, मनोवैज्ञानिक, जिला अस्पताल

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