Delhi Police बनाम Himachal Police: टकराव पर कानून क्या कहता है?
शिमला में क्या हुआ?
दिल्ली में एआई इम्पैक्ट समिट के दौरान हुए शर्टलेस प्रदर्शन मामले में दिल्ली पुलिस ने इंडियन यूथ कांग्रेस के तीन कार्यकर्ताओं—सौरभ, सिद्धार्थ और अरबाज—को शिमला से गिरफ्तार किया। आरोपियों को दिल्ली लाने के दौरान हिमाचल प्रदेश पुलिस ने आपत्ति जताई और दोनों राज्यों की पुलिस के बीच तीखा टकराव देखने को मिला।
दिल्ली पुलिस का कहना था कि उनके पास स्थानीय अदालत से वैध ट्रांजिट रिमांड है। वहीं हिमाचल पुलिस ने कथित प्रक्रिया संबंधी खामियों का आरोप लगाते हुए अज्ञात दिल्ली पुलिसकर्मियों के खिलाफ अपहरण का मामला दर्ज कर लिया। कई चेकपोस्ट पर रोक-टोक के बाद आखिरकार आरोपियों को दिल्ली लाया गया।
कानून क्या कहता है?
यह मामला अब इस बहस का विषय बन गया है कि ऐसी स्थिति में किस राज्य की पुलिस को वरीयता मिलती है।
नई आपराधिक प्रक्रिया संहिता, यानी Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita की तीन धाराएं यहां महत्वपूर्ण हैं।
धारा 45 के अनुसार, यदि कोई पुलिस अधिकारी बिना वारंट गिरफ्तारी के लिए अधिकृत है, तो वह आरोपी का देश के किसी भी हिस्से में पीछा कर सकता है। इसका अर्थ है कि दिल्ली पुलिस शिमला तक जाकर गिरफ्तारी कर सकती है।
धारा 82 कहती है कि यदि गिरफ्तारी संबंधित जिले से बाहर की जा रही है, तो स्थानीय पुलिस को सूचित करना आवश्यक है।
धारा 81 के तहत, यदि गिरफ्तारी वारंट स्थानीय अधिकार क्षेत्र से बाहर लागू किया जा रहा है, तो सामान्यतः उसे स्थानीय मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी से अनुमोदित कराया जाना चाहिए।
विशेषज्ञों और सुप्रीम कोर्ट की राय
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पुलिस राज्य सरकारों के अधीन होती है, लेकिन अपराध की प्रकृति सीमाओं में बंधी नहीं होती। संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत पुलिस राज्यों का विषय है, पर अंतरराज्यीय कार्रवाई के लिए सहयोग जरूरी है।
Supreme Court of India ने भी कई मामलों में ‘सहकारी संघवाद’ (Cooperative Federalism) पर जोर दिया है और कहा है कि ऐसे विवाद संवाद से सुलझाए जाने चाहिए।
अंततः, कानून पुलिस को सीमाओं से परे कार्रवाई की शक्ति देता है, लेकिन व्यावहारिक समाधान आपसी समन्वय और संवाद में ही निहित है।