अमेरिका–वेनेजुएला युद्ध विश्लेषण: ट्रंप की मंशा क्या, बुश की गलती क्यों दोहराई और भारत पर कितना असर पड़ेगा
अमेरिका और वेनेजुएला के बीच बढ़ता सैन्य टकराव अब केवल दो देशों का मामला नहीं रह गया है। शनिवार को अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर किए गए हमले और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनकी पत्नी समेत हिरासत में लिए जाने के बाद वैश्विक राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांतों पर सवाल खड़े करता है, बल्कि दुनिया को एक नए भू-राजनीतिक संकट की ओर भी धकेल सकता है।
तेल ही असली वजह? अमेरिका की नजर वेनेजुएला पर क्यों
वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है, जो 300 अरब बैरल से भी अधिक बताया जाता है। इसके अलावा देश में गैस और सोने के विशाल भंडार भी मौजूद हैं। अमेरिका लंबे समय से वेनेजुएला सरकार पर अवैध नशीले पदार्थों की तस्करी और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाता रहा है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि असली वजह ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण की है।
विदेश मामलों के जानकारों के मुताबिक, वॉशिंगटन से 3300 किलोमीटर दूर स्थित वेनेजुएला को अमेरिका अपने लिए “सुरक्षा खतरा” बताता है, जबकि वास्तविकता में यह रणनीतिक और आर्थिक हितों से जुड़ा मसला है।
क्या ट्रंप ने बुश वाली गलती दोहरा दी?
विदेश नीति विशेषज्ञ संजीव श्रीवास्तव के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछली अमेरिकी गलतियों से कोई सबक नहीं लिया। उन्होंने कहा कि 9/11 के बाद अफगानिस्तान पर हमला और 2003 में जॉर्ज बुश द्वारा इराक पर हमला आज भी अमेरिका की विदेश नीति की सबसे बड़ी असफलताओं में गिने जाते हैं।
इराक युद्ध में सद्दाम हुसैन को हटाने के नाम पर अमेरिका ने “विनाशकारी हथियारों” का हवाला दिया था, जो कभी मिले ही नहीं। इस युद्ध में हजारों नागरिकों और अमेरिकी सैनिकों की जान गई। श्रीवास्तव के मुताबिक, वेनेजुएला पर हमला उसी सोच की पुनरावृत्ति है।
चीन और रूस की भूमिका: क्यों बढ़ी वैश्विक चिंता
विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका के इस कदम से चीन और रूस को भी खुली चुनौती मिली है। हमले के समय चीन का प्रतिनिधिमंडल वेनेजुएला में मौजूद था, जबकि रूस पहले ही अमेरिकी कार्रवाई की निंदा कर चुका है।
श्रीवास्तव सवाल उठाते हैं कि अब अमेरिका किस आधार पर चीन को ताइवान पर हमला न करने की नसीहत देगा या रूस की आलोचना करेगा? यह कदम वैश्विक व्यवस्था में “डबल स्टैंडर्ड” को उजागर करता है।
पहला युद्ध, बड़ा खतरा
पूर्व विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर ने इसे ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का पहला युद्ध बताया। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने भले ही यूरोप में दखल न देने की बात कही हो, लेकिन लैटिन अमेरिका में उसकी दखलंदाजी और बढ़ गई है। यह लड़ाई लोकतंत्र के लिए नहीं, बल्कि तेल और खनिज संसाधनों के लिए है।
अकबर के मुताबिक, अगर वेनेजुएला अमेरिका-चीन-रूस टकराव का नया केंद्र बनता है, तो इसके परिणाम पूरी दुनिया को भुगतने पड़ सकते हैं।
भारत पर कितना असर पड़ेगा?
वेनेजुएला में भारत के पूर्व राजदूत आर. विश्वनाथन के अनुसार, इस घटनाक्रम से भारत पर सीधा असर पड़ने की संभावना कम है। भारत पहले वेनेजुएला से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता था, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद यह निर्भरता काफी घट गई है।
उन्होंने बताया कि 2013-14 में भारत अपनी कुल तेल जरूरत का करीब 7–8 प्रतिशत वेनेजुएला से लेता था, जो अब न के बराबर है। हालांकि, भारतीय तेल कंपनियों का वहां कुछ निवेश है, लेकिन उस पर भी सीमित असर की ही उम्मीद है।
ट्रंप का ‘एंड गेम’ क्या?
पूर्व राजदूत राजीव डोगरा के अनुसार, ट्रंप की नीति अन्य शक्तियों के लिए खतरनाक मिसाल बन सकती है। अगर अमेरिका इस तरह किसी देश की संप्रभुता को चुनौती दे सकता है, तो चीन जैसे देश भी भविष्य में ताइवान को लेकर ऐसा कदम उठा सकते हैं।
डोगरा का मानना है कि अगर ट्रंप वेनेजुएला और ईरान जैसे देशों के प्राकृतिक संसाधनों पर प्रभावी नियंत्रण हासिल कर लेते हैं, तो यह पूरी दुनिया के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा।
अमेरिका–वेनेजुएला टकराव केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा राजनीति और अंतरराष्ट्रीय कानून की परीक्षा है। आने वाले दिनों में यह संघर्ष दुनिया को किस दिशा में ले जाएगा, इस पर अब सबकी नजर टिकी है।