डॉक्टर हैं बीमार, कैसे होगा मरीजों का इलाज? जिला अस्पताल में मरीजों का भारी दबाव
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एक डॉक्टर पर 300 से 350 मरीज, इलाज पर पड़ रहा असर
जिला अस्पताल में डॉक्टरों पर मरीजों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि एक डॉक्टर रोजाना 100 से अधिक मरीज देख रहा है, जबकि कुछ विभागों में यह संख्या 300 से 350 तक पहुंच जाती है। निजी अस्पतालों में जहां सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक 15 से 30 मरीजों को समय देकर देखा जाता है, वहीं जिला अस्पताल में डॉक्टरों को बिना आराम लगातार मरीजों को देखना पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, एक डॉक्टर को 6 घंटे में औसतन 25 से 30 मरीज देखने चाहिए ताकि उसकी मानसिक और शारीरिक स्थिति संतुलित रहे और मरीज को बेहतर इलाज मिल सके, लेकिन जिला अस्पताल में यह आंकड़ा कई गुना अधिक है। सीजन बदलते ही मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ जाती है, जिससे डॉक्टरों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
इंटर्न डॉक्टरों के भरोसे ओपीडी, स्टाफ की भारी कमी
जिला अस्पताल के विभिन्न विभागों की स्थिति भी चिंताजनक है। फिजिशियन के पास रोजाना 200 से अधिक मरीज पहुंचते हैं और उनकी छुट्टी के दौरान पूरी ओपीडी इंटर्नशिप कर रहे नए डॉक्टरों के भरोसे चलती है। ऑर्थोपेडिक विभाग में केवल दो डॉक्टर हैं, जिनमें से एक ऑपरेशन थिएटर में रहता है और ओपीडी एक डॉक्टर के भरोसे संभाली जाती है, जबकि दूसरी ओपीडी इंटर्न डॉक्टरों द्वारा चलाई जाती है।
ईएनटी विभाग में भी यही स्थिति है, जहां डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर में रहते हैं और ओपीडी में इंटर्न डॉक्टर मरीजों को देखते और दवाएं लिखते हैं।
जांच सुविधाओं और टेक्नीशियन की कमी से मरीज परेशान
अस्पताल की तीसरी मंजिल पर अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे के लिए दोपहर तक लंबी कतारें लगती हैं। मशीनें उपलब्ध हैं, लेकिन केवल एक टेक्नीशियन ऑनलाइन एंट्री, जांच और कई बार रिपोर्ट तैयार करने का काम करता है, जिससे विवाद की स्थिति भी बन जाती है। रेबीज इंजेक्शन ओपीडी में रोजाना 400 से 500 मरीज पहुंचते हैं, लेकिन यहां भी केवल एक टेक्नीशियन तैनात है।
जिला अस्पताल की सीएमएस डॉ. अजय राणा के अनुसार, गौतम बुद्ध नगर में रोजाना चार हजार से अधिक मरीज ओपीडी में आते हैं, जबकि अस्पताल में केवल 66 डॉक्टर तैनात हैं। शासन से 27 और डॉक्टरों तथा उपकरणों की मांग की गई है, लेकिन अभी तक कोई ठोस जवाब नहीं मिला है