श्रीराम के वनवास प्रसंग पर भावुक हुए श्रोता, कथा में छलके आँसू

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सेक्टर-34 में चल रही रामकथा का छठवां दिन

भारतीय धरोहर विचार मंच द्वारा नोएडा के सेक्टर-34 कम्युनिटी सेंटर में आयोजित श्रीराम कथा के छठवें दिन भगवान श्रीराम के वनवास का मार्मिक प्रसंग सुनाया गया। कथा व्यास अतुल कृष्ण भारद्वाज ने अत्यंत भावपूर्ण और सचित्र वर्णन किया, जिसे सुनकर पंडाल में उपस्थित श्रोता भावुक हो उठे और कई लोगों की आंखों से आँसू छलक पड़े।

मर्यादा और त्याग का संदेश

कथा व्यास ने बताया कि भगवान श्रीराम ने अपने पिता के वचन और कुल की मर्यादा की रक्षा के लिए प्रसन्नतापूर्वक राज-पाट त्यागकर वन गमन स्वीकार किया। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि व्यक्ति को अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए त्याग करने की भावना रखनी चाहिए। उन्होंने राजा दशरथ के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि अच्छे कार्यों को टालना नहीं चाहिए, क्योंकि विलंब के परिणाम कभी-कभी दुखद हो सकते हैं।

कौशल्या, कैकेयी और लक्ष्मण का आदर्श

कथा में माता कौशल्या के धैर्य और त्याग का विशेष वर्णन किया गया। उन्होंने पुत्र के वनवास को भी धर्म और पति के वचन की मर्यादा के रूप में स्वीकार किया। व्यास जी ने कहा कि माता कैकेयी को नकारात्मक रूप में नहीं, बल्कि रामकथा के महत्वपूर्ण पात्र के रूप में देखना चाहिए। यदि कैकेयी का निर्णय न होता, तो रामराज्य की स्थापना और मर्यादा का संदेश पूरे भारत में न फैल पाता।
लक्ष्मण के समर्पण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा—“भाई हो तो लक्ष्मण जैसा।” लक्ष्मण ने माता से वन जाने की अनुमति मांगी और पूर्ण निष्ठा से श्रीराम के साथ चल पड़े।

श्रोताओं की भावुक प्रतिक्रिया

जब श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के वनगमन का प्रसंग सुनाया गया तो पूरा पंडाल भावुक हो गया। अयोध्यावासियों के पीछे-पीछे चलने का वर्णन सुनकर वातावरण भक्ति और करुणा से भर गया।

विशिष्ट जनों की उपस्थिति

कथा में मुख्य यजमान के रूप में विधायक पंकज सिंह सहित नरेश विक्कल, प्रमोद शर्मा, धर्मेंद्र शर्मा, पंकज त्रिपाठी, आशुतोष शर्मा और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

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