वीआईपी नंबर नीलामी पर सवाल: 49 लाख की बोली, अंत में 2.22 लाख में हुआ सौदा

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परिवहन विभाग द्वारा वीआईपी वाहन नंबरों की ऑनलाइन नीलामी का उद्देश्य जहां राजस्व बढ़ाना है, वहीं मौजूदा व्यवस्था अब सवालों के घेरे में आ गई है। ताजा मामला एफके सीरीज के सबसे चर्चित वीआईपी नंबर 0001 का है, जिसने विभागीय व्यवस्था की खामियों को उजागर कर दिया है। इस नंबर के लिए ऑनलाइन नीलामी में प्रदेश की अब तक की सबसे ऊंची बोली 49 लाख रुपये तक पहुंच गई थी, लेकिन अंत में यह नंबर महज 2.22 लाख रुपये में आवंटित कर दिया गया।

49 लाख की बोली, लेकिन भुगतान नहीं

परिवहन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, सबसे ऊंची बोली लगाने वाले व्यक्ति ने तय समय सीमा में रकम जमा नहीं की। नियमों के तहत इसके बाद यह नंबर दूसरी सबसे अधिक बोली लगाने वाले को दिया जाना था, लेकिन उसने भी नंबर लेने से इनकार कर दिया। यही सिलसिला आगे भी चलता रहा और एक के बाद एक कई बोलीदाता पीछे हटते चले गए।

आखिरकार, यह वीआईपी नंबर सातवें बोलीदाता को मात्र 2.22 लाख रुपये में आवंटित कर दिया गया। बताया जा रहा है कि यह नंबर एक रेंज रोवर कार के मालिक ने खरीदा है। जिस नंबर से विभाग को लाखों रुपये की कमाई हो सकती थी, वह बेहद कम कीमत पर चला गया।

0007 नंबर में भी दिखा यही हाल

सिर्फ 0001 ही नहीं, बल्कि 0007 नंबर की नीलामी में भी इसी तरह की स्थिति देखने को मिली। इस नंबर के लिए नीलामी के दौरान बोली 22 लाख रुपये तक पहुंची थी, लेकिन अंत में यह नंबर केवल 2.44 लाख रुपये में बेच दिया गया। लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने नीलामी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

‘ऊंची दुकान, फीके पकवान’ जैसी स्थिति

स्थानीय लोगों और वाहन मालिकों का कहना है कि वीआईपी नंबरों की नीलामी अब “ऊंची दुकान, फीके पकवान” जैसी हो गई है। आशंका जताई जा रही है कि इसमें फर्जी बोली का एक संगठित खेल चल रहा है। आरोप है कि जानबूझकर बेहद ऊंची बोली लगाई जाती है, जिससे असली खरीदार पीछे हट जाते हैं। बाद में बोली लगाने वाले रकम जमा नहीं करते और वही नंबर बेहद कम कीमत पर किसी अन्य व्यक्ति को मिल जाता है।

इस प्रक्रिया से न सिर्फ परिवहन विभाग को लाखों-करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है, बल्कि ईमानदार बोलीदाता भी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

पहले भी फंस चुका है लोगों का पैसा

वीआईपी नंबरों को लेकर अब तक हजारों ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जहां लोगों ने बोली लगाई, पैसे भी जमा किए, लेकिन न तो उन्हें मनचाहा नंबर मिला और न ही समय पर रिफंड। कई बोलीदाताओं ने इस संबंध में विभाग से शिकायतें भी की हैं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल सका है।

नियमों में बदलाव की मांग

इस पूरे मामले को लेकर शासन को पत्र लिखा गया है। अधिकारियों का कहना है कि व्यवस्था में सुधार के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे, ताकि भविष्य में इस तरह की अनियमितताओं को रोका जा सके।

नंद कुमार, एआरटीओ (प्रशासन), गौतमबुद्ध नगर ने कहा कि विभाग ऐसे मामलों को गंभीरता से ले रहा है और जल्द ही नियमों को और सख्त किया जाएगा।

अब देखने वाली बात यह होगी कि वीआईपी नंबर नीलामी की इस व्यवस्था में कब तक पारदर्शिता आती है और राजस्व के साथ-साथ आम लोगों का भरोसा कब बहाल हो पाता है।

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