फ्री ट्रेड, रुकावटें नहीं’: नॉर्वे ने भारत-ईयू की सबसे बड़ी डील का किया समर्थन
भारत-ईयू FTA फाइनल होने के करीब
भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौता (FTA) अब अंतिम चरण में पहुंचता दिख रहा है। इसे ‘सभी ट्रेड डील्स की जननी’ कहा जा रहा है। जैसे-जैसे यह समझौता फाइनल होने के करीब है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे समर्थन भी मिलने लगा है। इसी कड़ी में नॉर्वे ने भारत-ईयू FTA को खुलकर समर्थन दिया है।
नॉर्वे की राजदूत ने बताया मील का पत्थर
भारत में नॉर्वे की राजदूत मे-एलिन स्टेनर ने कहा कि आने वाला भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता भारत और यूरोप के संबंधों में एक मील का पत्थर साबित होगा। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा कि यह डील न केवल भारत और ईयू के रिश्तों को मजबूत करेगी, बल्कि नॉर्वे और पूरे यूरोपीय क्षेत्र के साथ भारत के व्यापारिक संबंधों को भी नई गति देगी।
ईयू का हिस्सा नहीं, फिर भी भारत के करीब नॉर्वे
हालांकि नॉर्वे यूरोपीय संघ का सदस्य नहीं है, लेकिन वह यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (EFTA) का अहम हिस्सा है। राजदूत स्टेनर ने बताया कि नॉर्वे और भारत के बीच ट्रेड एंड इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (TEPA) पहले ही लागू हो चुका है, जो 1 अक्टूबर से प्रभाव में है।
उन्होंने कहा, “यह भारत के साथ हमारे संबंधों में अपने आप में एक मील का पत्थर है।”
भारत-ईयू डील से पूरे यूरोप को फायदा
स्टेनर ने जोर देते हुए कहा कि भारत और ईयू के बीच होने वाला कोई भी समझौता पूरे यूरोप के साथ भारत के रिश्तों को मजबूत करेगा। उनके अनुसार, यूरोप के साथ भारत का आर्थिक एकीकरण नॉर्वे जैसे देशों के लिए भी सकारात्मक विकास है।
नॉर्वे ने क्यों किया खुला समर्थन
नॉर्वे की राजदूत ने बताया कि यूरोपीय संघ नॉर्वे का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है। ऐसे में भारत और यूरोप के बीच गहराता आर्थिक सहयोग ओस्लो के लिए भी फायदेमंद साबित होगा।
उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ट्रेड पॉलिसी का जिक्र करते हुए कहा कि नॉर्वे जैसी छोटी और ओपन इकोनॉमी को फ्री ट्रेड से सबसे ज्यादा लाभ मिला है।
‘नियमों पर आधारित सिस्टम में विश्वास’
मे-एलिन स्टेनर ने साफ कहा कि नॉर्वे नियमों पर आधारित मल्टीलेटरल ट्रेड सिस्टम में विश्वास करता है। उन्होंने कहा,
“हम ट्रेड बैरियर बढ़ाने में नहीं, बल्कि उन्हें खत्म करने में विश्वास करते हैं।”
नॉर्वे का यह बयान ऐसे समय आया है, जब वैश्विक स्तर पर व्यापार संरक्षणवाद और टैरिफ को लेकर बहस तेज है।