I-PAC छापेमारी मामला: सुप्रीम कोर्ट से ममता सरकार को बड़ा झटका, ईडी अधिकारियों पर दर्ज FIR पर रोक

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हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी लगाई रोक

राजनीतिक परामर्श देने वाली संस्था I-PAC (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) से जुड़े छापेमारी मामले में पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार को सुप्रीम कोर्ट से भी बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अधिकारियों पर दर्ज एफआईआर की कार्रवाई पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक मामले की अगली सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक एफआईआर के आधार पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। इस मामले में अब अगली सुनवाई 3 फरवरी को होगी।

बिना दबाव जांच होनी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस मामले में जांच किसी भी प्रकार के दबाव से मुक्त होकर होनी चाहिए। अदालत ने 8 जनवरी को जिन परिसरों में तलाशी ली गई थी, वहां की सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखने का भी निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाओं में राज्य सरकार द्वारा केंद्रीय एजेंसियों के काम में कथित हस्तक्षेप से जुड़े गंभीर सवाल उठाए गए हैं, जिनकी गहराई से जांच जरूरी है।

दो सप्ताह में जवाब मांगा गया

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने इस मामले में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, राज्य के पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने सभी से दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है।
ईडी ने आरोप लगाया है कि I-PAC के कार्यालय और इसके संस्थापक प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी के दौरान राज्य पुलिस और अन्य तत्वों ने जांच में हस्तक्षेप किया।

“जांच नहीं हुई तो देश में अराजकता फैल जाएगी”

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि केंद्रीय एजेंसियों की जांच में राज्य सरकारों द्वारा हस्तक्षेप के मुद्दे की जांच नहीं की गई, तो इससे देश में कानून-व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला कानून के शासन और संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है।
पीठ ने कहा कि यदि अपराधियों को किसी राज्य की कानून प्रवर्तन एजेंसियों का संरक्षण मिलने लगेगा, तो यह स्थिति अराजकता को जन्म दे सकती है।

सीबीआई जांच की मांग, सबूत लौटाने का भी आग्रह

ईडी ने न केवल सीबीआई जांच की मांग की है, बल्कि यह भी आरोप लगाया है कि I-PAC से जुड़े परिसरों से कुछ सबूत कथित तौर पर हटाए गए। एजेंसी ने इन सबूतों को वापस करने का निर्देश देने की भी मांग की है। इससे पहले ईडी ने इसी मांग को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट का भी रुख किया था, लेकिन वहां सुनवाई टल गई थी।

ईडी की दलील: गलत मिसाल बन सकती है

ईडी की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में दलील देते हुए कहा कि यह मामला बेहद गंभीर है और इससे एक खतरनाक मिसाल कायम हो सकती है। उन्होंने कहा कि यदि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई नहीं की गई तो केंद्रीय एजेंसियों का मनोबल टूटेगा और राज्य सरकारों को गलत संदेश जाएगा।
मेहता ने यह भी आरोप लगाया कि I-PAC के कार्यालय में आपत्तिजनक सामग्री मौजूद थी और जांच के दौरान भीड़तंत्र का माहौल बनाया गया।

“हाईकोर्ट को जंतर-मंतर बना दिया गया?”

सुनवाई के दौरान जस्टिस प्रशांत मिश्रा ने सवाल किया कि क्या 9 जनवरी को कलकत्ता हाईकोर्ट को जंतर-मंतर में बदल दिया गया था। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने दावा किया कि एक व्हाट्सएप संदेश के जरिए बड़ी संख्या में वकीलों को अदालत बुलाया गया, जिससे अराजक स्थिति पैदा हो गई और सुनवाई स्थगित करनी पड़ी।

कपिल सिब्बल की दलील और कोर्ट की प्रतिक्रिया

ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा कोई सबूत नहीं उठाया गया। उन्होंने दावा किया कि यह बात ईडी के अपने पंचनामा से साबित होती है।
हालांकि, कोर्ट ने इस दलील पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि मामले की जांच जरूरी है और नोटिस जारी करने से रोका नहीं जा सकता।

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश ने न केवल ममता सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, बल्कि केंद्र और राज्य एजेंसियों के बीच टकराव को भी राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दिया है।

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