प्रदूषण की मार: चाइल्ड पीजीआई में निमोनिया के मरीज बढ़े, सबसे ज्यादा असर छोटे बच्चों पर

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शहर में लगातार बढ़ते प्रदूषण का सीधा असर अब बच्चों की सेहत पर साफ दिखाई देने लगा है। चाइल्ड पीजीआई समेत शहर के बड़े अस्पतालों में निमोनिया और सांस संबंधी बीमारियों से पीड़ित बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। डॉक्टरों के अनुसार, सबसे ज्यादा प्रभावित नवजात और पांच साल से कम उम्र के बच्चे हो रहे हैं, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है।

ओपीडी में 40 प्रतिशत तक बढ़े मरीज

चाइल्ड पीजीआई के आंकड़ों के मुताबिक, रोजाना ओपीडी में 150 से अधिक बच्चों को इलाज के लिए लाया जा रहा है। इनमें बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की है, जिन्हें सांस लेने में परेशानी, खांसी और बुखार की शिकायत है। पीडियाट्रिक विभाग के डॉक्टर आशुतोष तिवारी ने बताया कि बीते कुछ हफ्तों में प्रदूषण बढ़ने के बाद बच्चों की ओपीडी में करीब 35 से 40 प्रतिशत तक इजाफा हुआ है।

प्रदूषित हवा से बच्चों के फेफड़ों को नुकसान

विशेषज्ञों के अनुसार, हवा में मौजूद धूल, धुआं और सूक्ष्म कण बच्चों के फेफड़ों पर सबसे ज्यादा असर डालते हैं। बच्चों की श्वसन प्रणाली पूरी तरह विकसित नहीं होती, ऐसे में प्रदूषित हवा उनके लिए ज्यादा खतरनाक साबित होती है। यही कारण है कि इस मौसम में निमोनिया और सांस की गंभीर बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं।

निमोनिया के प्रमुख लक्षण

डॉक्टरों के मुताबिक,

  • लगातार खांसी

  • तेज बुखार

  • सांस लेने में दिक्कत

  • सीने में घरघराहट

  • दूध या खाना न पीना

ये सभी निमोनिया के प्रमुख लक्षण हो सकते हैं। ऐसे में लापरवाही गंभीर रूप ले सकती है।

क्या करें और क्या न करें

डॉक्टरों ने अभिभावकों को सलाह दी है कि बच्चों को गर्म और साफ वातावरण में रखें, समय पर टीकाकरण कराएं और खांसी-बुखार की स्थिति में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। वहीं प्रदूषण वाले इलाकों में बच्चों को घुमाने से बचें और बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाइयां न दें।

समय पर इलाज से संभव है पूरा इलाज

डॉ. आशुतोष तिवारी ने कहा कि सही समय पर पहचान और इलाज से निमोनिया पूरी तरह ठीक हो सकता है। स्वास्थ्य विभाग ने भी अभिभावकों से अपील की है कि बदलते मौसम और बढ़ते प्रदूषण के बीच बच्चों की सेहत को लेकर पूरी सतर्कता बरतें और किसी भी लक्षण को नजरअंदाज न करें।

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