‘धुरंधर’ में मनोरंजन के नाम पर पक्षपात का आरोप

धुरंधर’ रिव्यू: दमदार एक्शन और तकनीक के बीच संवेदनशीलता पर उठे सवाल

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आदित्य धर की नई फिल्म ‘धुरंधर’ रिलीज़ से पहले ही चर्चा में थी, और अब रिलीज़ के बाद यह बहस का विषय बन गई है। फिल्म तकनीकी रूप से शानदार, एक्शन से भरपूर और बड़े स्केल पर बनाई गई है, लेकिन कई समीक्षकों का कहना है कि इसकी कहानी में मौजूद पक्षपातपूर्ण प्रस्तुतियाँ और संवेदनशील मुद्दों की हैंडलिंग दर्शकों को असहज भी कर देती है।

1999 कंधार हाईजैक—एक भारी शुरुआत

फिल्म की शुरुआत 1999 के कंधार हाईजैक जैसी वास्तविक और दर्दनाक घटना से होती है।
IB चीफ अजय सन्याल (आर. माधवन) विमान में फंसे यात्रियों का मनोबल बढ़ाने की कोशिश करते हैं और “भारत माता की…” का नारा लगाते हैं, लेकिन कोई जवाब नहीं आता।
उनकी इस कोशिश पर एक पाकिस्तानी हाईजैकर का संवाद—
“तुम हिंदू कितने डरपोक हो”
सीधे दर्शकों को झकझोरने की कोशिश करता है। यह सीन बताता है कि आगे फिल्म किस दिशा में जाने वाली है।

जासूसी नहीं, गैंगस्टर ड्रामा बन जाती है कहानी

हालाँकि शुरुआत में फिल्म एक जासूसी थ्रिलर का अहसास कराती है, लेकिन कहानी जल्द ही गैंगस्टर ड्रामा का रूप ले लेती है।
मुख्य एजेंट हमज़ा (रणवीर सिंह) शुरू में केंद्रीय भूमिका में दिखते हैं, लेकिन धीरे-धीरे पीछे छूट जाते हैं।
कहानी का फोकस शिफ्ट होकर इन पर आ जाता है:

  • रहमान डकैत (अक्षय खन्ना) – एक शक्तिशाली अपराध सरगना

  • चौधरी असलम (संजय दत्त) – एक टफ पुलिस अधिकारी

  • जमी़ल जमाली (राकेश बेदी) – राजनीतिक खिलाड़ी

इन किरदारों का प्रस्तुतीकरण दमदार है और इनके संवाद कई जगह भारी पड़ते हैं।

बलोचिस्तान की पृष्ठभूमि और जटिल संघर्ष

फिल्म को बलोचिस्तान की आज़ादी की लड़ाई से जोड़कर दिखाया गया है। इससे कहानी में

  • स्थानीय गैंग

  • आतंकवादी गुट

  • पश्तूनों की अंदरूनी खींचतान
    जैसी परतें जुड़ती हैं।
    कई घटनाएँ अनुमानित लगती हैं, लेकिन प्रतिभाशाली कलाकारों का अभिनय और तनावपूर्ण दृश्य दर्शकों को जोड़े रखते हैं।

तकनीक दमदार लेकिन संदेश पर विवाद

एक्शन सीक्वेंस, सिनेमैटोग्राफी और प्रोडक्शन डिज़ाइन बेहतरीन हैं। फिल्म अपनी तकनीकी गुणवत्ता से प्रभावित करती है, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाती है—
क्या संवेदनशील मुद्दों को मनोरंजन के नाम पर इस तरीके से पेश करना सही है?

कई समीक्षकों का मत है कि फिल्म भावनाओं को उकसाने की कोशिश करती है, और यही इसकी सबसे बड़ी आलोचना बनकर सामने आती है।

फैसला दर्शकों पर

‘धुरंधर’ एक बड़ी, तेज़-रफ़्तार और तकनीकी रूप से असरदार फिल्म है।
लेकिन जो दर्शक संवेदनशील विषयों की संतुलित प्रस्तुति चाहते हैं, उन्हें यह फिल्म सोचने पर मजबूर कर सकती है कि मनोरंजन और विचारधारा की सीमाएँ कहाँ तक खींची जानी चाहिए।

navya seth
navya seth
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