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नोएडा चाइल्ड पीजीआई में रैंडमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल पर विशेष व्याख्यान, डॉक्टरों को मिली गहन जानकारी

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चाइल्ड पीजीआई में शोध पर केंद्रित विशेष कार्यक्रम

पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ (चाइल्ड पीजीआई), नोएडा में मेडिकल एजुकेशन यूनिट (MEU) ने बच्चों के सुरक्षित और बेहतर इलाज के लिए शोध को मजबूत बनाने के उद्देश्य से एक विशेष व्याख्यान आयोजित किया। कार्यक्रम का संचालन MEU की संयोजक और पैथोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. ज्योत्स्ना मदान ने किया।

इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में गोरखनाथ मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल एवं डीन, डॉ. अनुराग श्रीवास्तव शामिल हुए। उन्होंने बायो-मेडिकल शोध में “रैंडमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल (RCT)” की भूमिका को सरल भाषा में समझाया।

मरीजों के लिए क्यों जरूरी है आरसीटी?

डॉ. श्रीवास्तव ने बताया कि रैंडमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल एक ऐसा वैज्ञानिक तरीका है जिससे डॉक्टर यह पता लगा सकते हैं कि कोई नई दवा, नया इलाज या तकनीक वास्तव में असरदार और सुरक्षित है या नहीं।

इस प्रक्रिया में मरीजों को दो समूहों में बांटा जाता है—

  • पहला समूह: नई दवा या नया इलाज लेता है

  • दूसरा समूह: पुराना या सामान्य इलाज पाता है

दोनों समूहों के परिणामों की तुलना करके पता चलता है कि नई दवा कितनी प्रभावी है।

उन्होंने कहा कि आरसीटी शोध में होने वाली गलती, पूर्वाग्रह और भ्रम को काफी कम कर देता है। इसी वजह से इसे दुनिया में सबसे विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण माना जाता है और नई दवाओं व तकनीकों को मंजूरी भी इसी आधार पर मिलती है।

डॉक्टरों को मिला शोध पर व्यावहारिक ज्ञान

व्याख्यान के दौरान प्रतिभागियों को शोध डिजाइन, क्लिनिकल ट्रायल चलाने की प्रक्रिया, नैतिक अनुमति, और डेटा विश्लेषण जैसे विषयों पर विस्तृत जानकारी दी गई।

अंत में सवाल-जवाब सत्र हुआ, जिसमें डॉक्टरों और शोधार्थियों ने अपने सवाल रखे। संस्थान का कहना है कि इस तरह के कार्यक्रम बच्चों के इलाज को भविष्य में और अधिक सुरक्षित, आधुनिक और प्रभावी बनाने में मदद करेंगे।

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