“मेरे बेटे को मौत दे दो सरकार” – पिता की पुकार, सुप्रीम कोर्ट करेगी फैसला
12 साल से बिस्तर पर पड़े हरीश राणा की इच्छामृत्यु पर विचार
मामला क्या है?
नोएडा सेक्टर-39 में रहने वाले 31 वर्षीय हरीश राणा पिछले 12 वर्षों से क्वाड्रीप्लेजिया से पीड़ित हैं—एक ऐसी स्थिति जिसमें शरीर के चारों अंग काम करना बंद कर देते हैं। वह पूरी तरह बिस्तर पर निर्भर हैं और प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हैं। इसी हालात में उनके पिता ने सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु (Euthanasia) की अनुमति मांगते हुए याचिका दायर की।
पिता का कहना है—
“अगर जीना ही दर्द हो गया है तो सरकार हमें मरने का हक दे।”
सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा आदेश
अदालत ने इस मामले को बेहद गंभीर मानते हुए स्वास्थ्य विभाग को मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया है। यह बोर्ड तय करेगा कि क्या हरीश को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) दी जा सकती है।
अस्पताल को 2 सप्ताह के अंदर रिपोर्ट पेश करनी होगी।
12 साल से संघर्ष की कहानी
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2013 में पंजाब विश्वविद्यालय PG हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद से हरीश चलने-फिरने में असमर्थ हैं।
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पिछले साल उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती भी किया गया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ।
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डॉक्टरों ने अब घर पर ही देखभाल जारी रखने का सुझाव दिया है।
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परिवार का कहना है कि आर्थिक और मानसिक स्थिति बेहद खराब हो चुकी है।
अदालत में क्या बोले वकील?
हरीश के वकील रश्मि नंदकुमार ने कोर्ट में दलील दी कि कॉमन कॉज़ 2018 फैसले के अनुसार पहले मेडिकल जांच आवश्यक है।
जरूरत पड़ने पर सेकेंडरी बोर्ड भी बनाया जा सकता है ताकि यह तय हो सके कि जीवन रक्षक उपचार हटाया जाए या नहीं।
पहले भी हुआ इंकार, पर हालात बदले
दिल्ली हाईकोर्ट पहले 2023 और 2024 में इच्छामृत्यु की अनुमति देने से इंकार कर चुका है। कारण यह बताया गया था कि हरीश वेंटिलेटर या किसी कृत्रिम जीवन-रक्षक उपकरण पर निर्भर नहीं हैं।
लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने माना—
“परिवार के लिए यह स्थिति असहनीय और बेहद पीड़ादायक है। आगे का फैसला मेडिकल रिपोर्ट के बाद लिया जाएगा।”
अगला कदम
अब फैसले की चाबी मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में है।
अगर बोर्ड स्थिति को अपरिवर्तनीय और असहनीय मानता है, तो भारत में यह उन दुर्लभ मामलों में शामिल होगा जहाँ कोई परिवार अपने बेटे की मौत को ही राहत मानने पर मजबूर हुआ।