चार नए लेबर कोड पर मजदूरों में उबाल
सुरक्षा घटने और शोषण बढ़ने का आरोप, ट्रेड यूनियनों ने चेताया बड़ा आंदोलन
ट्रेड यूनियनों का आरोप—लेबर रिफॉर्म नहीं, मजदूर अधिकारों को कमजोर करने की तैयारी
केंद्र सरकार के चार नए लेबर कोड को लेकर मजदूरों, फैक्ट्री कर्मचारियों और ट्रेड यूनियनों में नाराजगी लगातार बढ़ रही है। सीटू (CITU) समेत कई संगठनों का कहना है कि यह कानून मजदूरों के हितों को सुरक्षित करने के बजाय निजीकरण, असंगठित रोजगार और ठेका प्रथा को बढ़ावा देंगे। यूनियनों का आरोप है कि इन कोड के लागू होने से श्रमिकों की सुरक्षा, आय और अधिकार—तीनों पर गहरा असर पड़ेगा।
वेज कोड पर सवाल: “कंपनियां कम कर देंगी बेसिक सैलरी”
सीटू के जिला अध्यक्ष मुकेश कुमार ने बताया कि वेज कोड में ‘वेज’ की परिभाषा इस तरह तय की गई है कि कंपनियां बेसिक वेतन को कम दिखाकर भत्तों में कटौती कर सकती हैं। इससे—
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ओवरटाइम,
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पीएफ,
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ईएसआई,
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ग्रेच्युटी
जैसे कई लाभ प्रभावित होंगे। यूनियनों का कहना है कि न्यूनतम वेतन तय करने की प्रक्रिया अस्पष्ट होने से राज्यों में असमानता बढ़ जाएगी। वेज कोड का उद्देश्य आय बढ़ाना था, लेकिन मजदूर संगठनों के अनुसार यह कमाई घटा सकता है।
सोशल सिक्योरिटी कोड: “लाभ का वादा, लेकिन स्पष्ट व्यवस्था नहीं”
दूसरा कानून सोशल सिक्योरिटी कोड सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को एक ढांचे में लाता है, लेकिन यूनियनों का आरोप है कि:
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सरकार की जिम्मेदारी घटाकर निजी कंपनियों और गिग प्लेटफॉर्म्स पर डाल दी गई है,
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असंगठित क्षेत्र के लिए कोई स्पष्ट बजट नहीं,
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सुरक्षा लाभ तय नहीं, सिर्फ वादा है।
इसके कारण लाखों असंगठित मजदूरों के लाभ अनिश्चित हो सकते हैं।
इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड: “हड़ताल पर रोक, छंटनी होगी आसान”
सबसे विवादित इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड 300 तक कर्मचारियों वाली कंपनियों को बिना सरकारी अनुमति छंटनी और बंदी की अनुमति देता है। यूनियनों का कहना है कि इससे—
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स्थायी रोजगार कम होगा,
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ठेका सिस्टम तेजी से बढ़ेगा,
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हड़ताल लगभग असंभव हो जाएगी।
ग्रेटर नोएडा के मजदूर सुनील ने बताया कि हड़ताल नोटिस देने की दूरी 100 मीटर से बढ़ाकर 300 मीटर कर दी गई है, जहां अक्सर दूसरी कंपनी आती है। यह नियम विरोध को कमजोर करने के लिए बनाया गया है।
OSH कोड: छोटे उद्योगों को राहत, मजदूरों के लिए खतरा?
चौथे कानून ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन कोड (OSH) में सुरक्षा प्रावधान शामिल हैं, लेकिन यूनियनों का कहना है कि छोटे प्रतिष्ठानों को नियमों से बाहर कर दिया गया है।
इससे—
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हादसों का खतरा बढ़ेगा,
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साफ-सफाई, बैठने की सुविधा, पीने का पानी,
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और काम के घंटे जैसी जरूरतें कमजोर होंगी।
नोएडा के फैक्ट्री कर्मचारी पारस का कहना है कि नए कोड मजदूरों से संगठन, सुरक्षा और आवाज उठाने का अधिकार छीन रहे हैं।
40 करोड़ मजदूर प्रभावित होने की आशंका—यूनियनों ने पुनर्विचार की मांग की
ट्रेड यूनियनों का कहना है कि इन चारों लेबर कोड का असर देश के 40 करोड़ से अधिक मजदूरों पर पड़ेगा। उन्होंने सरकार से मांग की है कि—
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कोड को वापस लेकर संशोधन किए जाएं,
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मजदूर हितों और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए,
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हड़ताल और संगठन का अधिकार बहाल रखा जाए।
संगठनों का कहना है कि विकास तभी संभव है जब मजदूरों को सम्मान, सुरक्षा और स्थायी रोजगार मिले।