परिसीमन लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा संवैधानिक संकट या सुधार का मौका
भारत का अगला लोकसभा चुनाव जिस साल होगा, उससे ठीक पहले देश को एक ऐसा फैसला लेना है जो पिछले 50 साल से टलता चला आ रहा है। वह है नया परिसीमन (Delimitation)। 2026 में 84वें संविधान संशोधन से लगी सीटों की फ्रीज की समय-सीमा खत्म हो रही है। इसके बाद पहली बार 1971 की जनगणना के बाद लोकसभा और विधानसभाओं की सीटें वास्तविक जनसंख्या के हिसाब से दोबारा बांटी जा सकेंगी। परिसीमन आखिर है क्या? परिसीमन का मतलब है लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएँ और राज्यों के बीच सीटों की संख्या को नई जनगणना के आधार पर फिर से तय करना। संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 में साफ लिखा है कि हर दशकीय जनगणना के बाद यह काम अनिवार्य है। यह काम एक स्वतंत्र परिसीमन आयोग करता है जिसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज होते हैं और सदस्य होते हैं मुख्य चुनाव आयुक्त व राज्य चुनाव आयुक्त। आयोग के फैसले को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।अब तक क्या-क्या हुआ?1952, 1963, 1973 और 2002 में चार परिसीमन हो चुके हैं।
1971 की जनगणना के बाद लोकसभा सीटें 543 तय हुई थीं।
1976 में इमरजेंसी के दौरान 42वें संविधान संशोधन से सीटों को 2001 तक फ्रीज कर दिया गया था ताकि परिवार नियोजन करने वाले राज्यों (केरल, तमिलनाडु आदि) की सीटें कम न हों। 2001 में 84वें संशोधन से यह फ्रीज 2026 तक बढ़ा दी गई। 2002 के परिसीमन में सिर्फ क्षेत्रों की सीमाएँ बदली गईं, राज्यों के बीच सीटों की संख्या नहीं।
आज की विकृति कितनी गहरी है? वर्तमान में:
उत्तर प्रदेश (आबादी, 24 करोड़) → 80 लोकसभा सीटें
बिहार (आबादी, 13 करोड़) → 40 सीटें
महाराष्ट्र ( आबादी, 12.5 करोड़) → 48 सीटें
केरल (आबादी, 3.6 करोड़) → 20 सीटें
तमिलनाडु (आबादी, 7.7 करोड़) → 39 सीटें
यानी एक उत्तर प्रदेशी सांसद औसतन 30 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि केरल का सांसद सिर्फ 18 लाख का। “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” का सिद्धांत आज कागजों पर ही रह गया है।2026 के बाद अगर नया परिसीमन हुआ तो क्या होगा?उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड जैसे हिंदी पट्टी के राज्यों की सीटें बढ़ेंगी। केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना जैसे दक्षिणी राज्यों की सीटें कम हो सकती हैं।
लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़कर 750-850 तक जा सकती हैं महिला आरक्षण कानून (33% सीटें महिलाओं के लिए) भी तभी लागू होगा, क्योंकि उसकी शर्त ही नई जनगणना + नया परिसीमन है।
राजनीतिक तूफान क्यों आने वाला है?
- दक्षिण भारतीय राज्य पहले से ही चेतावनी दे चुके हैं कि अगर उनकी सीटें जनसंख्या के हिसाब से कम हुईं तो वे इसे “उत्तर भारत पर दक्षिण भारत का वर्चस्व खत्म करने की साजिश” मानेंगे। वहीं हिंदी पट्टी के राज्य इसे “संवैधानिक न्याय” बता रहे हैं। दो रास्ते हैं देश के सामने2026-27 में नई जनगणना नया परिसीमन → सीटें जनसंख्या के हिसाब से बांटना (संवैधानिक रूप से सही, लेकिन उत्तर-दक्षिण खाई बढ़ने का खतरा)
फिर कोई संशोधन करके फ्रीज को 2031 या उससे आगे बढ़ाना (राजनीतिक रूप से आसान, लेकिन संविधान की भावना के खिलाफ)
केंद्र सरकार 2025-26 में जनगणना करवाने और उसके बाद परिसीमन करने की तैयारी में है। लेकिन दक्षिण के बड़े नेताओं ने साफ कह दिया है, “बिना हमारे हितों की रक्षा के हम मानने वाले नहीं हैं।”अब सवाल आपसे हैक्या हम 50 साल पुरानी उस गलती को दोहराएँगे जो इमरजेंसी में हुई थी? या फिर संविधान की मूल भावना “हर वोट का बराबर मूल्य” को बहाल करेंगे, चाहे इसके लिए कितना ही बड़ा राजनीतिक जोखिम उठाना पड़े? 2029 का आम चुनाव शायद इस सवाल का जवाब दे देगा। तब तक सिर्फ इतना याद रखिए, लोकतंत्र में चुप रहना भी एक स्टैंड है।