देश के बदलते पर्यावरण ने हर उम्र में फेफड़ों पर बढ़ाया दबाव
प्रदूषण, धुआं और देर से पहचान में आने वाले लक्षण बीमारी को बना रहे हैं गंभीर
ईएसआईसी अस्पताल में सप्ताह भर में 100 से अधिक मरीज चेस्ट स्पेशलिस्ट के ओपीडी में पहुंच रहे हैं। ईएसआईसी के चेस्ट स्पेशलिस्ट डॉ. सोबीत बंसल ने बताया कि यहां आने वाले अधिकतर मरीज ऐसे होते हैं जो ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में अभी भी लकड़ी, फसल का कचरा और गोबर जैसे बायोमास ईंधन से खाना पकाते हैं, जिससे घरों में लगातार धुआं भरता है। वहीं शहरों में रहने वाले लोगों में वाहनों का धुआं, उद्योगों से निकलने वाले कण, निर्माण कार्य, कूड़ा जलना और मौसम बदलते ही फैलने वाला स्मॉग फेफड़ों पर सीधा असर डालता है। दोनों स्थितियों में सांस की नलियों में सूजन बढ़ती जाती है और समय के साथ फेफड़ों की क्षमता घटती रहती है।
जिला अस्पताल में भी यही स्थिति
जिला अस्पताल के फिजिशियन डॉ. प्रदीप शैलत ने बताया कि सीओपीडी की समस्या सर्दी में ज्यादा बढ़ जाती है। फिलहाल, इसके मरीज रोजाना 100 -150 आते हैं, जो 40 वर्ष और इससे अधिक के होते हैं। इस बीमारी में मरीज कई लोग सांस फूलने, थकान या लगातार खांसी जैसे संकेतों को सामान्य परेशानी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। स्पाइरोमेट्री जो सीओपीडी की सबसे महत्वपूर्ण जांच है अभी भी सामान्य स्वास्थ्य परीक्षणों में शामिल नहीं है। इसी वजह से बीमारी अक्सर तब पकड़ में आती है जब फेफड़ों को काफी नुकसान हो चुका होता है। युवाओं में वेपिंग, तेज सुगंध वाले एरोसोल्स, खानपान से बढ़ने वाली सूजन और संक्रमण के बाद रह जाने वाली कमजोरी से भी जोखिम बढ़ा है। जागरूकता की कमी और झिझक भी बड़ी चुनौती है। अस्थमा को लोग जल्दी पहचान लेते हैं लेकिन सीओपीडी को लेकर जानकारी बेहद कम है। कई मरीज तब तक इलाज नहीं कराते जब तक स्थिति गंभीर न हो जाए।
निजी अस्पतालों के डॉक्टर ने क्या बताया
बीमारी को न करें नजर अंदाज
फोर्टिस नोएडा के अतिरिक्त निदेशक पल्मोनोलॉजी डॉ राहुल शर्मा नियमित फेफड़ों की जांच को अनिवार्य मानते हैं। उनका कहना है कि सांस फूलना सामान्य लक्षण नहीं है। इसे नजरअंदाज करने से बीमारी बढ़ती जाती है। स्पाइरोमेट्री को नियमित जांच का हिस्सा बनाना चाहिए। पिछले तीन महीनों में सांस की बीमारियों से जुड़ी शिकायतों में तीस से चालीस प्रतिशत बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कई मरीज ऐसे हैं, जिन्होंने कभी सिगरेट नहीं पी जो यह साफ दिखाता है कि प्रदूषण, बायोमास का धुआं, काम की वजह से धूल का सामना, संक्रमण और सेकंड हैंड धुएं का असर भी उतना ही हानिकारक होता है।
निजी अस्पताल के डॉक्टर का कहना है कि भारत में सीओपीडी का बढ़ता बोझ रोका जा सकता है। साफ ईंधन की उपलब्धता, प्रदूषण नियंत्रण, शुरुआती स्पाइरोमेट्री जांच, धूम्रपान मुक्त वातावरण, टीकाकरण और जन जागरूकता इस बीमारी को कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।